Sunday, October 25, 2015

हरामखोर


बपचन के मित्र ने बताया कि जबसे शिकार पर पाबंदी लगी तब से बंद हो गया, लेकिन पाबंदी से पहले उनके यहां जंगली सूअरों का शिकार कर, उसका मांस खूब खाया गया है। बेहतरीन खस्सी से भी उम्दा होता है जंगली सूअरों का गोश्त... बेहद स्वादिष्ट!

शिकार मेरी समझ से बाहर की चीज है। हम खेतिहर लोग हैं। हमारे इलाके में जंगल नहीं रहा कभी। विकास से पहले वो पूरा इलाका... गंगा, गंडक, कोसी, करेह के जलामय इलाकों में था। पानी में डूबी जमीन में मछली तो मारी जा सकती है, वनैले सूअरों का शिकार मुमकिन ही नहीं।

लेकिन बाबा के मुंह से सुना करता था... कि कभी-कभी गाछी में बनैले सुअर दिख जाया करते थे। उनकी कहानी में ये अनुभव भी था, वो बताया करते थे "वनैला सूअर एकदम नाक की सीध में, निशाना बनाकर चलता है। जो कभी वो तुम्हारे पीछे पड़ जाए, तो तुम्हें टेढ़ा-मेढ़ा भागना चाहिए, तब वो तुम्हें नहीं पकड़ पाएगा।"

मतलब ये कि हमारे इलाके में जंगली सूअर, देखकर भागने की चीज थे, मित्र के इलाके में पीछा कर मार दिए जाने की चीज। उनका इलाका जंगल के पास है, हिमालय की तराई में, अब वहां टाइगर रिजर्व है। तो वहां शिकार का चलन रहा और खूब रहा है।

तो वनैले सूअर का मांस, मेमने के मांस से भी बेहतर और उम्दा होता है।

उन्होने बताया कि चम्पारण जिले के उनके शहर में अब एक पूरा बाजार ही विकसित हो गया है जहां, वनैला तो नहीं लेकिन देसी सुअर का गोश्त खूब बिकता है। लोग झोला-भर-भर खरीद ले जाया करते हैं। देसी मतलब, अक्सर ड्रेनेज और काले कीचड़ में लोटे रहनेवाला काला सूअर। खरीददारों में कैथलिक ईसाई तो हैं ही, उनसे ज्यादा संभ्रांत और उच्च जाति के हिन्दू हैं।

सूअर... हराम है, और हराम को खाना, हरामखोरी।

पटना में राजेंद्र नगर के पास कुछ झुग्गियां बनी थी, पैंतीस साल पहले की बात है। एक दिन वहां से गुजरते देखा कि एक दो तीन लोग सूअर को पकड़े हुए थे और एक व्यक्ति उसे लोहे के मोटे रॉड से पीट रहा हैं, एक व्यक्ति उसके शरीर में गरम एक रॉड गोंध रहा है... वो सूअर किसी हाथी से भी ज्यादा तेज आवाज में चीख रहा था। लौटते वक्त देखा कि वो सूअर दो खूंटे पर टंगा है और नीचे आग जल रही है।

अब मित्र के शहर में...
सूअर का मांस खरीदनेवाले ज्यादातर लोग हिन्दू हैं... मतलब कि पोर्क खाने का चलन, जो सूअर पालनेवाली कुछ जातियों तक सीमित था, वो फैल गया है। दशहरा के बाद खस्सी के बजाए कुछ इलाकों में पोर्क भी जमकर खाया जा रहा है।

पोर्क... ये हैरानी की बात नहीं है हमारे लिए। क्रिश्चन मिशनरी के बोर्डिंग में रहते, पहली बार सफेद विलायती सूअर देखने का मौका मिला। अंग्रेज पादरियों की तरह ही एकदम सफेद सूअर। अजीब लगता और अच्छा भी कि नालियों में लोटे नहीं, एकदम साफ-सुथरे बाड़े में बंद रहते थे। जब भी पादरियों को उनका मांस खाना होता तो, वो उनकी हत्या, जिबह या बलि नहीं करते, उन्हें गोली मार देते थे।

जब भी अहाते में गोली की चलने की आवाज गूंजती तो हम समझ जाते, आज रेक्टर हाउस के मेस में पोर्क बननेवाला है।  

इसके करीब दस साल बाद...
दीरांग जाना हुआ एक फिल्म के सिलसिले में। दीरांग जिला है, अरुणाचरण प्रदेश में...चीन से सटा इलाका है। तो उसका प्रभाव भी है। तब दिल्ली में मोमोज इतनी सहजता से नहीं मिलते थे। चाणक्य सिनेमा के पास कुछ स्टॉल थे जो मोमोज परोसते थे।

मोंपा जनजातियों का इलाका था। लेकिन दीरांग में हर जगह मोमोज मिल रहे थे। विचार हुआ कि मोमोज खाया जाय। वो भी नानवेज मोमोज... कीमत पूछी गई और परोस देने को कहा गया। मैंने जैसे ही पहला निवाला काटा कि ध्यान आया कि ये नानवेज मोमोज; इतना सस्ता क्यों बेच रहे हैं? (नानवेज का मतलब हम चिकन ही समझते रहे थे।) अचानक से दो दिन से इलाके के मोंपा गांवों का दौरा करते सारे नजारे कौंध गए।

पहाड़ी इलाके के गांव में खंभो पर बने हर घर के नीचे... सूअर पाले गये थे... घर की सारी गंदगी, जिसमें बच्चों का मल-मूत्र तक भी था, घर से उसी बाड़े में गिरती थी और सूअर उसमें डूबे मस्त रहते थे। उसी गांव में एक जगह एक कत्ल-खंभा भी दिखा, (नाम नहीं याद आ रहा उसका), पूछने पर पता चला कि वहां मवेशियों खासकर गाय और याक को काटा जाता है। मोंपा जनजाती का वो पूरा इलाका याक की पूजा भी करता था।

मुंह में मोमो का कौर(निवाला) था वो भी नॉनवेज और नॉनवेज का पूरा मतलब ध्यान आ गया। मैंने दुकानदार जो कि एक बेहद खूबसूरत औरत थी, से पूछा कि इसमें क्या भरा है, पोर्क या बीफ?  उसने एकदम सहजता से कह दिया पोर्क है.... बीफ हमेशा नहीं मिलता है।

मैले में लोटे हुए सूअर का मांस मेरे मुंह में था... सोचिए कैसी दशा हुई होगी मेरी? उल्टी नहीं की, बाकी सारा कुछ हो गया। साथ के सहयोगी ने कहा, अरे मुंह में चला ही गया तो अब घिन कैसी... मांस निकाल दीजिए और मैदा खा लीजिए... मुझसे तो नहीं हुआ, पर उन्होने ऐसा किया।

पोर्क के लिए मची मारा-मारी के बारे में मित्र ने जब बताया तो लगा विचित्र है हमारा समाज भी... 

मेरे दीरांग गए बीस साल होने को हैं... तब लेकर अब तक हालात बहुत बदल गए हैं। पोर्क के गोश्त के लिए हिन्दू मारा-मारी करने लगे हैं। मोमोज और समोसे में कोई फर्क ही नहीं रहा अब। फिर भी लोग...
ऐसा कैसे हो सकता है कि हम आगे-पीछे दोनों तरफ, एक साथ बढ़ पाएं,  विकास भी करें और पिछ़ड़ेपन को भी दांत से पकड़े रहे, ये तो मुमकिन ही नहीं है।

ब्रह्मांड में कुछ भी आगे और पीछे दोनों तरफ नहीं चलता है।

1 comment:

Shamsul Qamar said...

हा हा हा, सचमुच आपके हालत की कैफियत का अंदाजा लगा सकता हूँ.