एक गांव की बात है। उस गांव के सारे-के-सारे लोग समझदार थे, जबरदस्त ज्ञानी। उनको कुछ भी जानने की जरूरत नहीं थी। वो एकदम पर्याप्त थे, सम्पूर्ण समझदार। सो ना तो वो कुछ समझते, न कुछ सुनते। दुनिया की किसी भी बात का उन्हें पता ही नहीं होता था, जरूरत ही नहीं थी कि उनको सबकुछ मालूम जो था।
वे सबकुछ जानते थे, इसी से किसी को पहचानते भी नहीं थे।
अब एक बार की बात, बरसात का मौसम था। तालाब में कहीं से एक मेंढ़क आ गया। अपने पूरे जीवन में गांववालों में से किसी ने भी मेंढ़क नहीं देखा था। पूरा गांव ही उसे देखने के लिए वहां पर जमा हो गया। सब-के-सब आंखे फाड़-फाड़कर देखने लगे। उसमें से किसी को भी पता नहीं था कि आखिर यह है क्या। सब-के-सब सोचते रहे। फिर उनमें से एक बोला, “यह है हिरण।”
तो दूसरे ने विरोध किया, “अरे भाई! ये तो बगुला है, बगुला। तुम्हें कुछ पता भी है?”
इसपर तीसरे ने समझदारी दिखाई, बोला, “अरे भाई! बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देते हो। यह तो भई सियार है। बरसात के दिन हैं ना, इसलिए जंगल से निकलकर इधर आ गया है।”
इस बीच चौथे ने अपनी टाँग अड़ाई, “अरे झगड़ते क्यों हो? अपने गाँव में एक है ना सयाना। वही सबसे अकलमंद है। वही बताएगा कि यह क्या है। हम कहाँ समझ पाएंगे इसे।”
अब सबमिल कर सयाने को बुलाने गए। सयाने को गांववालों के आने की वजह पता चली तो वो नाचता गाता तलाब के पास पहुंचा और लगा सबको डाँटने, “अरे तुम सब-के-सब जीवन भर मूरख ही बने रहोगे। कुछ तो सीखने की भी कोशिश किया करो कभी!”
अब जी, सयाना आया मेंढ़क के पास और अपनी आँखों पर हाथ रखकर उसे ध्यान से देखने लगा। ध्यान से देखने के बाद बोला, “अरे इसमें क्या है! देखते नहीं, इसकी चपटी नाक? यह या तो चकवा है और अगर चकवा नहीं तो, मोर तो पक्का ही है।” सबको सच्चाई पता चल गयी और सब अपने-अपने कामों में लग गए।
इसी गांव में एक छोटा सा किला था और उसमें था एक दरवाजा।
एक बार की बात, रात के समय कहीं से एक हाथी आया और किले के आँगन में पसर गया। सुबह हुई तो सबने आंगन में इतना बड़ा जीव देखा। सब हैरान हो गए, लगे सोचने, “अरे! यह क्या!”
हालाँकि सवेरा हो गया था लेकिन आंगन में अभी भी अँधेरा ही था। अब किसी ने समझदारी दिखाई और बोला, “हो न हो, यह तो भैंस का पाड़ा है?“
किसी दूसरे ने ज्यादा सयानापन दिखाते कविता की। बड़ी अक्लमंदी से उनके कहा, “नहीं, नहीं, यह तो बादल की परछाई है।“ उसकी बात सुनकर सभी आकाश में बादल देखने लगे, वहां काले बादल थे, तो सबको लगा ये कवि सही ही बोल रहा है। तभी हवा चली और बादल छंट गए और धूप निकल आई। हाथी जहां था वहीं पड़ा रहा तो ये बात किसी की समझ नहीं आई कि बादल चले गए और परछाई क्यों छूट गई।
तभी किसी ने कहा, “अरे, बुलाओ ना अपने सयाने को। वही तय करेगा कि यह क्या है।“ सब सयाने के घर गए.. पर वो, वहाँ था नहीं। सबने एक साथ सयाने को आवाज लगाई तो पता चला कि सयाना जो है वो एक बेहद ऊंचे पेड़ की फुनगी बैठा, आसामान की तरफ देख रहा है। लोगों ने जानना चाहा कि वो ऊपर पेड़ पर क्या कर रहा है। सयाने से बताया कि वो आसमान ठीक कर रहा रहा है।
सही में उसके हाथ कुछ ऐसी चीजें भी थीं जिससे कोई कुछ ठीक कर सकता है। सयाने ने आगे समझाया कि कल रात की बारिश में उसका छप्पर टपक रहा था, सो उसने सोचा कि कहां हर साल अपना छप्पर ठीक करता रहूंगा, आसामान ही ठीक कर लेता हूं। सब उसकी समझदारी से बहुत खुश हुए।
तो नई चुनौती सामने आने की बात सुन, नाचता-गाता सयाना आया और अपनी आंखों पर हाथ रखकर हाथी को ध्यान से देखने लगा। चारो तरफ से काफी गौर से देखने के बाद वो बोला, “अरे इसमें क्या है! देखते नहीं, यह तो रात का अंधेरा आसमान से धरती पर उतर आया है। ये दो निशान देख रहे ना? ये जगमग करते निशान? इनमें से एक चांद है, दूसरा सूरज।“
“हुम्म्म्म” - समझदारी भरी एक लंबी हुंकार गूंजी। सब-के-सब समझ गए, समझते हुए सिर हिलाया और अपनी राह चल पड़े।
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ये गांव, वो वाला गांव नहीं था, जहां रात को हाथी गुजरा तो सुबह में लाल बुझक्कड़ ने गाया था...
लाल बुझक्कड़ बूझिया, और न बूझा कोय.
पैर में चक्की बांधके, हरि ही कूदन होय
वो तो गांव ही अलग है, लालबुझक्कड़ का गांव, एकदम ही अलग है।
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कहानी परम आदरणीय स्वर्गीय गिजुभाई बधेका की है। 1885 में गुजरात में जन्मे गिजुभाई सैंकड़ों लोगकथाएं एकत्रित कीं और बच्चों के लिए 200 से ज्यादा किताबें लिखी। शिक्षा के लिए नया तरीका अपनाने के लिए गिजुभाई, दुनिया पर में सम्मानित हैं।
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कहानी को रोचक बनाने के लिए कुछ संपादकीय स्वतंत्रता लेने के लिए क्षमा याचना.
वे सबकुछ जानते थे, इसी से किसी को पहचानते भी नहीं थे।
अब एक बार की बात, बरसात का मौसम था। तालाब में कहीं से एक मेंढ़क आ गया। अपने पूरे जीवन में गांववालों में से किसी ने भी मेंढ़क नहीं देखा था। पूरा गांव ही उसे देखने के लिए वहां पर जमा हो गया। सब-के-सब आंखे फाड़-फाड़कर देखने लगे। उसमें से किसी को भी पता नहीं था कि आखिर यह है क्या। सब-के-सब सोचते रहे। फिर उनमें से एक बोला, “यह है हिरण।”
तो दूसरे ने विरोध किया, “अरे भाई! ये तो बगुला है, बगुला। तुम्हें कुछ पता भी है?”
इसपर तीसरे ने समझदारी दिखाई, बोला, “अरे भाई! बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देते हो। यह तो भई सियार है। बरसात के दिन हैं ना, इसलिए जंगल से निकलकर इधर आ गया है।”
इस बीच चौथे ने अपनी टाँग अड़ाई, “अरे झगड़ते क्यों हो? अपने गाँव में एक है ना सयाना। वही सबसे अकलमंद है। वही बताएगा कि यह क्या है। हम कहाँ समझ पाएंगे इसे।”
अब सबमिल कर सयाने को बुलाने गए। सयाने को गांववालों के आने की वजह पता चली तो वो नाचता गाता तलाब के पास पहुंचा और लगा सबको डाँटने, “अरे तुम सब-के-सब जीवन भर मूरख ही बने रहोगे। कुछ तो सीखने की भी कोशिश किया करो कभी!”
अब जी, सयाना आया मेंढ़क के पास और अपनी आँखों पर हाथ रखकर उसे ध्यान से देखने लगा। ध्यान से देखने के बाद बोला, “अरे इसमें क्या है! देखते नहीं, इसकी चपटी नाक? यह या तो चकवा है और अगर चकवा नहीं तो, मोर तो पक्का ही है।” सबको सच्चाई पता चल गयी और सब अपने-अपने कामों में लग गए।
इसी गांव में एक छोटा सा किला था और उसमें था एक दरवाजा।
एक बार की बात, रात के समय कहीं से एक हाथी आया और किले के आँगन में पसर गया। सुबह हुई तो सबने आंगन में इतना बड़ा जीव देखा। सब हैरान हो गए, लगे सोचने, “अरे! यह क्या!”
हालाँकि सवेरा हो गया था लेकिन आंगन में अभी भी अँधेरा ही था। अब किसी ने समझदारी दिखाई और बोला, “हो न हो, यह तो भैंस का पाड़ा है?“
किसी दूसरे ने ज्यादा सयानापन दिखाते कविता की। बड़ी अक्लमंदी से उनके कहा, “नहीं, नहीं, यह तो बादल की परछाई है।“ उसकी बात सुनकर सभी आकाश में बादल देखने लगे, वहां काले बादल थे, तो सबको लगा ये कवि सही ही बोल रहा है। तभी हवा चली और बादल छंट गए और धूप निकल आई। हाथी जहां था वहीं पड़ा रहा तो ये बात किसी की समझ नहीं आई कि बादल चले गए और परछाई क्यों छूट गई।
तभी किसी ने कहा, “अरे, बुलाओ ना अपने सयाने को। वही तय करेगा कि यह क्या है।“ सब सयाने के घर गए.. पर वो, वहाँ था नहीं। सबने एक साथ सयाने को आवाज लगाई तो पता चला कि सयाना जो है वो एक बेहद ऊंचे पेड़ की फुनगी बैठा, आसामान की तरफ देख रहा है। लोगों ने जानना चाहा कि वो ऊपर पेड़ पर क्या कर रहा है। सयाने से बताया कि वो आसमान ठीक कर रहा रहा है।
सही में उसके हाथ कुछ ऐसी चीजें भी थीं जिससे कोई कुछ ठीक कर सकता है। सयाने ने आगे समझाया कि कल रात की बारिश में उसका छप्पर टपक रहा था, सो उसने सोचा कि कहां हर साल अपना छप्पर ठीक करता रहूंगा, आसामान ही ठीक कर लेता हूं। सब उसकी समझदारी से बहुत खुश हुए।
तो नई चुनौती सामने आने की बात सुन, नाचता-गाता सयाना आया और अपनी आंखों पर हाथ रखकर हाथी को ध्यान से देखने लगा। चारो तरफ से काफी गौर से देखने के बाद वो बोला, “अरे इसमें क्या है! देखते नहीं, यह तो रात का अंधेरा आसमान से धरती पर उतर आया है। ये दो निशान देख रहे ना? ये जगमग करते निशान? इनमें से एक चांद है, दूसरा सूरज।“
“हुम्म्म्म” - समझदारी भरी एक लंबी हुंकार गूंजी। सब-के-सब समझ गए, समझते हुए सिर हिलाया और अपनी राह चल पड़े।
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ये गांव, वो वाला गांव नहीं था, जहां रात को हाथी गुजरा तो सुबह में लाल बुझक्कड़ ने गाया था...
लाल बुझक्कड़ बूझिया, और न बूझा कोय.
पैर में चक्की बांधके, हरि ही कूदन होय
वो तो गांव ही अलग है, लालबुझक्कड़ का गांव, एकदम ही अलग है।
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कहानी परम आदरणीय स्वर्गीय गिजुभाई बधेका की है। 1885 में गुजरात में जन्मे गिजुभाई सैंकड़ों लोगकथाएं एकत्रित कीं और बच्चों के लिए 200 से ज्यादा किताबें लिखी। शिक्षा के लिए नया तरीका अपनाने के लिए गिजुभाई, दुनिया पर में सम्मानित हैं।
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कहानी को रोचक बनाने के लिए कुछ संपादकीय स्वतंत्रता लेने के लिए क्षमा याचना.

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