Sunday, October 25, 2015

उनकी जिम्मेदारी लिखने की है...


गुलजार ने कहा है कि साहित्यकारों का विरोध जताने का इकौलाता उपाय पुरस्कार और सम्मान लौटाना ही है।
तमगे तो वापस हो भी जांए, पैसे भी.. सम्मान कैसे वापस किया जाए? कैसे मुमकिन है वो? साहित्यकारों के पास समर्थन जताने का तरीका तब क्या है? चालीसा लिख देना... यही तो है ना?|

जब समर्थन लिखकर होता है, तो विरोध भी लिख कर होना चाहिए। नहीं क्या? साहित्यकार, वक्त को दस्तावेज में दर्ज करते हैं। उन्हें इस काले-समय को भी निर्भीक हो, दस्तावेजों में दर्ज कर देने की जरूरत है।  तमाशा करना, अपनी जिम्मेदारियों से हट राजनीति करना है।

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साहित्यकारों का काम अपनी रचनाओं में खून बहा देना है।

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगानेवाली,
दिल ही नहीं दिमागों में भी आग लगानेवाली,

तो क्या आधुनिक साहित्यकारों का अपनी कलम की ताकत पर से भरोसा उठ गया है? ये मान लिया जाए कि कलम अब चूक गई है और बदलाव, आन्दोलन और सुमाज सुधार का इकौलाता तरीका सड़कों पर जमा हो
सनसनी मचाना ही बचा है। पर उसका असर तो अस्थाई होता है।

रे रोक युधिष्ठि को ना यहां, जाने दे उसको स्वर्गधीर,
पर फिरा हमें गांडिव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर...

ये दिनकर ने लिखा था... वो विरोधी थे हमेशा ही सविनय अवज्ञा के, विनम्रता के.. उनकी कई रचनाएं इसी विरोध की वजह से लिखी गईं थी कि उन्हें लगता था कि अति विनम्रता युवाओं को भीरू बना देगी तो उन्होंने काव्य रचनाएं की। उनकी रचनाओं का असर हुआ। जिसे लोग वीर रस करते हैं, समझते हैं, दरअसल अति-विनम्रता और गांधी जी के हमेशा ही झुके रहनेवाले विचार का उनका विरोध था। उनका विरोध कारगर भी था... कि उनकी रचनाओं से रगों को आग दौड़ने लगती है।

ये है साहित्यकार...जो वक्त का सामना, भविष्य में करता है।
वो मौजूदा वक्त से हो रहे नुकसान को भांपता है और भविष्य में उसके असर को निरस्त करने की योजनाओं पर काम करने लगता है... क्योंकि कवि दूरदर्शी होता है...वो जानता है कि मौजूदा वक्त का असर भविष्य में होने वाला है, तो वो भी उसी भविष्य की तरफ अपना ब्रह्मास्त्र चलाता है। ये आधुनिक युद्ध की तरह है, जहां मिसाइल को उसके समानांतर ही दूसरी मिसाइल चला कर टारगेट पर पहुंचने के ठीक पहले नष्टकर दिया जाता है।

अभी जो हालात है, ये सबूत है कि भूतकाल के इन साहित्यकारों ने सही काम नहीं किया। उन्होंने समाज को सही दिशा नहीं दी। अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभाई। जो अपनी ही करतूतों का नतीजा सामने हो, तो उसका विरोध कैसा? जैसे समाज की रचना में.. आपने योगदान दिया, वैसा समाज अब सामने है तो उसे नकार कैसे सकते हैं आप? ये महान-दृश्य... आपकी ही करतूत का नतीजा है। ये आपकी अदूरंदेशी या स्वार्थी हो जाने का, समाज के साथ आपकी धोखाधड़ी का खामियाजा है... और इसकी कीमत समाज को चुकानी पड़ेगी। क्योंकि आपने अपना काम ठीक से नहीं किया। अब भी आप वही कर रहे हैं...

आप वर्तमान में जी रहे हैं...
भविष्य फिर से और अब भी खतरे में है....
कि साहित्यकारों का काम भविष्य पर नजर रखना है... आप प्रतिरोधी रचनाएं नहीं, राजनीति कर रहे हैं।
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लेखकों का तरीका बस लेखन ही हो सकता है। लेखक बंदूक लेकर युद्ध में शामिल हो जाए तो वो लेखक नहीं, योद्धा हो रहा है। फिल्मकारों का तरीका फिल्में हो सकती हैं। फिल्मकार बम गिराने लगे तो वो विनाशक हो रहा है।

आप ये नहीं कह सकते हैं लेखक भी युद्ध में शामिल हुए। दरअसल जिस वक्त एक लेखक ने लेखन के अलावा दूसरा कोई रास्ता अपनाया, तो वो लेखक रहा ही नहीं।

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