Tuesday, October 20, 2015

तुम्हारी नज़र से...


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उस दिन...
जितना तुम संवर सकती थी, संवर कर आई।
बुलाया
मुझे... दरवाजे के पास...

कि देखूं मैं तुम्हें कि कैसी दिखती हो तुम.
तो देखा मैंने तुम्हें और बहुत प्यार आया तुमपे,
इसलिए नहीं कि तुम बहुत सुंदर लग रही थी...
वो तो देखा ही नहीं मैंने...
देखी मैंने तुम्हारी कोशिश, तुम्हारा प्यार, उसकी एकाग्रता
,
कि तुम खुद को मेरी आंखों से देखने की कितनी कोशिश करती हो..

वो सारा संवरना तुम्हारा
... मेरे लिए था,
कि सुन्दर लगो तुम मुझे,
अच्छा लगे मुझे
,

उस दिन भी कहा था
और जब भी याद आता है वो दिन
कहता हूं हर बार
कि मुझे तुमसे प्यार है।
बेहिसाब प्यार...

हर बार, जब भी तुम्हें लगता है
कि तुम सुंदर दिखती हो,
कि ये तो मुझे पसंद है
कि ये तो एकदम वैसा ही है
, जैसा मैं बतियाता हूं...
तो तुम्हारी आंखे
, मेरी हो जाती हैं,
और तुम खुद को ही देखने लगती हो, मेरी नजर से...

बेहद ललचाई,
मुग्ध और गरिमामय नजर से खुद को निहारना तुम्हारा,
मुझतक पहुंचता है.
और मैं देख लेता हूं तुमको...
तुम्हारी नजर से!

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अपने संवाद संग्रह 'मेरे तुम' से
आनंद के क़ष्ण

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