Friday, October 16, 2015

औरत की जगह, यहां मेरी जांघ पर है !


औरत की जगह यहां मेरी जांघ पर है...
...दुर्योधन ने कहा था। फौलादी शरीर होने के बाद भी, वो उसी जांघ के टूटने से मारा गया, जिसे उसने औरत को अ्पमानित करने के लिए ठोंका था।

रुद्रमादेवी के खलनायकों का विचार भी यही है...
कमाल ये कि ये खलनायक कोई एक व्यक्ति नहीं, पूरा समाज, पूरा देश है, पूरा सामराज्य है।

"औरतों का काम क्या है? उसे तो भगवान ने मर्दों का दिल बहलाने के लिए बनाया है, अपने बदन से और अदाओं से सज संवरकर उनकी सेवा करने, उन्हें खुश करने के लिए।"

शुरू में एक बच्ची के जन्म पर, शुरूआती इस टिप्पणी का जवाब ये देना था कि ऐसा नहीं है”.
 
बस तीन अक्षर के इतने से जवाब के लिए एक बड़ी लंबी और शानदार कहानी कही गई। कहानी शानदार थी। बहुत बढ़िया, लेकिन उसका प्रस्तुतिकरण... कमजोर और उबाऊ था। बाहूबली के इल्लायाराजा यहां भी थे लेकिन पता नहीं चला कि इल्लाराजा हैं।

कहानी सचमुच दमदार थी, पर लगता है बाहूबली के बाद जल्दीबाजी में इसे जारी कर देने की कोशिश की गई। इसी से फिल्मांकन, स्क्रीनप्ले, कैमरा, लाइट, एनीमेशन, स्पेशल इफ्फेक्ट तमाम तकनीकी पक्ष कमजोर रह गए। सबसे बुरा तो है कि अभिनय पक्ष को भी नजरअंदाज कर दिया गया। इतनी जल्दीबाजी क्यों. इन कमजोरियों पर हावी होने केलिए फिल्म को थ्रीडी बना दिया। भाई जब लोग मार्शियन्स, ट्रांसफार्मर जैसी फिल्में थ्रीडी में देख रहे हैं तो एकदम बचकाना एनीमेशन वाली सस्ती थ्रीडी उन्हें क्यों भाएगी।

सरकार की तरह काहे व्यवहार करते हो?
जिससे पैसा लेते हो उसे ही मूर्ख समझते हो, अजब है यार!

मैं कई बार कहूंगा कि कहानी बहुत अच्छी थी। दुर्गापूजा के वक्त के लिए इससे बेहतर कहानी हो नहीं सकती। निर्माताओं को भी इसे पूजा से जोड़कर जारी करना चाहिये था। प्रचार में अगर वो रुख रखा होता तो लोग देखते... वो रिलेट कर सकते थे, दुर्गा मां को...

कहानी ऐतिहासिक है। एक विलक्षण वीरांगना... साम्राज्ञी की कथा है। जिसके जनमते है पिता को सत्ताच्युत हो जाना था कि उनके घर वारिस नहीं, बेटी पैदा हुई है। आगे की पूरी कथा वही थी कि कैसे एक बेटी, उस समाज में वारिस होती है, जो स्त्री के द्वारा शासित होने का विरोध ही नहीं करता। इसके विरुद्ध विद्रोह कर देता है।

आज भी तो ऐसा है कि जिस घर परिवार में केवल बेटी है उसे असुरक्षित और अरक्ष्य (जिसका कोई रक्षक नहीं समझा जाता है) समझा जाता है। बेटियों का केवल मन से ही नहीं तन से भी मजबूत बनाये जाने की जरूरत है। अंगद की तरह कि वो जहां पांव जमा दें वहां से उन्हें हटाना मुमकिन ही ना हो। तभी ऐसा होगा कि उनकी रक्षा करने की जरूरत से ऊपर उठ, वो दूसरों की रक्षा कर सकने के लायक हो सकेंगी। भाई ही क्यों रक्षा करेगा बहन की? बहन क्यों नहीं भाई की रक्षा करेगी?। ताउम्र पिता ही क्यों रक्षा करता रहेगा, माता-पिता के बुढ़ापे में बेटी इतनी ताकतवर क्यों नहीं होगी कि वो उस आदमी की गर्दन तोड़ दे, जो उसकी मां या पिता को बूढ़ा समझ धक्का दे रहा हो। बेटियों को शारीरिक रूप से ताकतवर और समर्थ होने की जरूरत है इस समाज में।

ये मेरा मानना है...
वैसे बेटियों को जूते के नीचे रखने के विचार वाले लोगों की कमी तो है नहीं... तो मेरा कथन उनके लिए नहीं है। वो यहां बहस ना करे... कहीं और जाएं।

फिल्म की कहानी ऐसी ही थी। एक राजकुमारी... समाज के दवाब के चलते राजकुमार की तरह पली, बढ़ी और शासन किया... शौर्य, वीरता, विवेक और कुशलता से। लेकिन जब उसके लडकी होने का खुलासा हुआ तो प्रजा विद्रोह पर उतर आई... फिर उसी राजकुमारी ने मूर्ख प्रजा (भारत की प्रजा आज से मूर्ख नहीं है) की दुश्मनों से रक्षा करती है।

बढ़िया कहानी... बकवास प्रस्तुतिकरण...
बढ़िया कहानी के लिए अगर आप बकवास प्रस्तुतिकरण को झेल सकते हैं तो देख लेना चाहिए ये फिल्म...

फिल्म में अल्लू अर्जुन देखने लायक हैं... वैसे वो कभी भी देखने लायक ही होते हैं। अनुष्का शेट्टी के हाव-भाव तो बढ़िया है, लेकिन एक्शन में वो नफासत नहीं लाया जा सकता है। एक्शन फिल्म है लेकिन स्टंट कंपोजर एकदम सस्ता, फूहड़, अनुभवहीन लग रहा है। निर्माता को कम से कम उसपर ज्यादा पैसे खर्च करना चाहिए था। किया होता तो ये फिल्म माता दुर्गा के अवतार वाली फिल्म साबित होती। फिल्म पर जल्दीबाजी का असर दिखता है।  
 

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