साहित्यकारों ने सम्मान वापस कर दिया...
हंगामा काहे हो रहा है? सही तो कर रहे... उनको सद्बुद्धि आई है कि वो तो सम्मानित किए जाने लायक थे ही नहीं। समाज, सरकार से गलती हुई।
सरकार भूंजे की तरह पुरस्कार बांटने लगी है जैसे टीवी पर टैलेंट की बाढ़ है। भाई, सच बात तो ये है कि हमारे टैलेंट का स्तर ऊंचा हो गया है। एक बेहद टैलेंटेड व्यक्ति भी अब किसी लायक नहीं। वैसे में औसत टैलेंडेट को सम्मानित करेंगे तो यह तो होगा ही।
ये लोग तो उसके लायक ही नहीं थे।
भारत में जितनी कहानियां लिखी जा चुकी हैं, जितना काव्य हो चुका है... वो इतना विस्तृत और विशाल है कि अब और किसी कहानी और कविता की जरूरत नहीं। हजारों साल पहले लिखी कविताएं और कहानियां ही पढ़ ली जाएं तो आपको अपने भाव-अभिव्यक्ति के लिए हर चीज लिखी मिल जाएगी। आपको अपने भाव नए लगेंगे ही नहीं।
लेकिन आदमी ठहरा अहंकारी... और मूर्ख भी...
घटना उसके साथ घटी नहीं है, तो हुई ही नहीं। अगर भावना उसमें आई, तो ही वो सर्वव्यापी है, तभी वो वैलिड है। किसो को प्यार हुआ तो उसके मुताबिक उसके पहले प्यार था ही नहीं, वो पहला व्यक्ति है, जिसे प्यार हुआ है। वो प्यार का एक्सपर्ट बनने की कोशिश करेगा, जैसे उसकी बात ब्रह्मवाक्य और पहली बार कही गईं है। दरअसल वो अपने पहले हुए असंख्य प्यार से अनजाना है, इसी से उसको अपना हुआ प्यार नायाब और महान लग रहा है।
बच्चे रोज पैदा होते हैं, सड़कों पर बिलबिलाते रहते हैं... लेकिन जब किसी युवा-युवती को अपना बच्चा होता है तो वो ऐसे व्यवहार करते हैं कि इससे पहले बच्चे हुए ही नहीं थे, संसार में मां-बाप बस वही बने हैं। दरअसल वो अंधे हैं... उन्हें अपने पहले के उन अनगिनत माता-पिताओं का पता नहीं है।
जेफरी आर्चर, बिकाऊ लेखक हैं.... खूब बिकी उनकी लघुकथाएं।
लेकिन अगर आपने लघुकथाएं पढ़ रखी हों तो आप जान जाएंगे कि यह महान लेखक दरअसल, मोपांसा, मोम, चेखव, ताल्सताय की कहानियां दोहरा रहा है। इतनी बेशर्मी से दोहरा रहा है कि वो उसे अपना तक बता,उसकी रॉयली ले रहा है। भारत में भी यही दशा है...
पिछले पचास बरसों में ज्यादातर बकवास साहित्य की रचना हुई है। ये लोग साहित्य के कारोबारी थे...धंधेबाज। इन लोगों ने साहित्य की सेवा नहीं की, धंधा किया है उसका। कहानी कहने की कला को बाजार बना देने का बहुत महान काम किया है इन लोगों ने। इन्हें पुरस्कार भी इसी काम के लिए मिला है।
हां, पचास बरसों से साहित्य के क्षेत्र में केवल कूड़े का योगदान हुआ है... वो केवल दोहराव है।
कॉर्बन कॉपी करने के लिए पुरस्कार या सम्मान मिलना ही नहीं चाहिए था। सम्मानित किए जाने का ये कारोबार ही बंद होना चाहिए.... चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो...
भारत रत्न, राहित्य रत्न, श्रेष्ठतम अभिनेता, महान गायक.... ये सब बकवास और फालतू के चोंचले हैं। ये साहित्य, काबीलियत को प्रोत्साहन के लिए था, लेकिन जब साहित्य, काबीलियत यू ही बह रही है तो उसे प्रोत्साहन की जरूरत ही क्या है?
जो लोग महान हैं, उन्हें किसी परिचय और पारितोषिकी की जरूरत नहीं। वो बस महान है... उनकी महानता का परिचय ईनाम से मुमकिन नहीं होग... वो परियच इतिहास खुद खोज लेगा।

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