यहां कुछ अश्लील शब्दों से आपका सामना हो सकता है। जो आपके मुताबिक अश्लील होंगे, पर मेरे लिए नहीं हैं वो अश्लील। मेरे लिए अश्लीलता - भूखे नंगे बच्चे हैं। बेसहारा बुजुर्ग हैं। सूखे पेड़ हैं। स्याह काला पानी है। कालिख भरी जहरीली हवा है। बिकती औरत हैं... बंजर जमीन है, मरता किसान और गरीब है। मेरे लिए ये सारी चीजें अश्लीलता हैं, पर आपका विचार कुछ और हो सकता है...
शाम को वॉक करते वक्त देखा कि एक साठ-पैंसठ साल का एक आदमी, एक युवक के पैर पकड़ रहा था। ध्यान आया कि जिस जगह वो ऐसा कर रहा था, वहीं पर वो अपनी चाय की दुकान चलाता है। रोजाना सुबह- शाम उसे वहां देखा जा सकता है।
पास ही कुछ कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है, एक दिन हमलोग जब उसकी चाय की दुकान के पास से गुजर रहे थे कि उसी वक्त हमारे बगल से सड़क की दूसरी तरफ से दो औरतें गुजरीं। उस व्यक्ति ने उनकी तरफ कुछ फब्तियां फेंकी। एक औरत जो थोड़ा युवा थी, वो उस आदमी की टिप्पणी से मुस्कुराई, लेकिन जिसकी उम्र ज्यादा थी वो एकदम गंभीर बनी रही, और वहां से गुजर गई।
हमने आपस में बात की। मैंने कहा - "देखा इस कमीने को... उन औरतों के ना चाहते हुए भी इस हरामखोर ने उनका मजा ले लिया।"
अब वापस पैर पकड़जाने वाली घटना वाली जगह पर – युवक उसको समझा रहा था। लेकिन वो आदमी उसके पैर छोड़ ही नहीं रहा था। युवक पढ़ा लिया किसी, कहीं अच्छी जगह काम करनेवाला लग रहा था। वो छुटकारा पाने के लहजे में उस आदमी को टालने की कोशिश कर रहा था। हम उन्हें वहीं छोड़ आगे बढ़ गए।
अगली चक्कर में वो युवक और वो आदमी... दोनों वहां नहीं थे। हमारी रुचि इसलिए थी कि वो आदमी जिस भाषा में बात कर रहा था, वो जानी पहचानी बोली थी। बीस कदम आगे बढ़े तो देखा कि एक औरत एक बड़े बांस से उस आदमी को पीटे जा रही है। वो आदमी बार-बार कह रहा है - "और मारो, और मारो.. जोर से मारो... और जोर से मारो..."
उस औरत के हाथ में जो बांस था, वो इतना बड़ा था कि उससे संभाले नहीं संभल रहा था। लेकिन वो किसी तरह उस आदमी को मारे जा रही थी। साथ में एक लड़की भी थी, जो मार तो नहीं रही थी लेकिन वो मारनेवाली के साथ थी। पास ही चार पांच सात साल के दो तीन बच्चे भटक रहे थे। एक छोटा बच्चा उस लड़की की गोद में भी था जो मारनेवाली औरत का था।
किसी ने दूर से कहा – “अरे क्यों मारती है... इसके हाथ-पैर बांध दे” ये सुनना था कि वो लड़की जोर-जोर से बोलने लगी। - “हरामखोर बाप है हमारा, कहता है चोदेगा हमको। मना करने पर मारपीट करता है।“ उस लड़की के आरोप, और उसकी स्थिति से मन खिन्न हो गया... अब आगे बढ़ गए।
दोबारा लौट आए तो बांस से मारने वाली औरत दूर खड़ी थी। वो लड़की भी अपनी उससे कुछ कदम दूर अंधेरे में खड़ी थी, लेकिन वो आदमी नहीं दिख रहा था। लगा... चलो अश्लीलता खत्म हुई।
लेकिन अगली बार लौटे तो देखा कि पास ही घूम रहा छह-सात साल का बच्चा उस लड़की के हाथ में एक डंडा पकड़ा रहा था। औरत भी वहीं खड़ी थी, जो कह रही थी कि वो आदमी कोई नहीं लगता है उसका। हाथ में डंडा आने के पहले से ही लड़की बिना रुके लगातार बोले जा रही थी - “मैं यहां चोदवाने आई हूं, जो तू मुझे चोदेगा। अब... दिखा चोद के मुझको। मुझे यहां इसीलिए लेकर आया था... अब हाथ तो लगा”। यही बात दोहराते हुए वो लगातार उसे पीटे जा रही थी। जवाब में उस आदमी ने भी उस लड़की को दो तीन चांटे लगाए, बदले में लड़की ने भी पलट कर जोर से धक्का दिया, फिर लगी डंडे से पिटाई करने।
आपको इसमें अश्लीलता दिख रही होगी। लेकिन हमको इसमें स्पष्टता दिखी। उस लड़की की स्पष्ट समझ और उसके स्पष्ट अभिव्यक्ति उसके अधिकार के लेकर उसकी सजगता बता रहे थे।
वो आदमी, पति ना सही पर उस औरत का मर्द था, चाहे कुछ ही दिनों से, कुछ ही दिनों के लिए हो। वो लड़की उस आदमी की ही बेटी थी या नहीं पर उस औरत की बेटी जरूर थी। लड़की, दोनों में से किसी की बेटी नहीं भी हो, और गांव से उनके पास काम के खातिर आई हो, लेकिन एक बात साफ थी वो लडकी अपने अधिकार और स्वतंत्रता के बारे में बखूबी जानती थी। उसकी प्रतिक्रिया में निर्लज्जता नहीं, स्पष्टता थी... स्थिति की स्पष्टता कि और सब तो ठीक है लेकिन कोई मेरी मजबूरियों का लाभ ले मुझे चोद नहीं सकता। (इस शब्द के बदले बदतमीजी, यौनाचार, अश्लील हरकतें, शोषण वैगेरह, सभ्य समाज के कई शालीन शब्द मुमकिन है लेकिन वो अस्पष्ट और दुविधापूर्ण शब्द हैं। अधिकार और हक की लड़ाई में हमारे विचार साफ होने चाहिए।)
सामने पिता था, जो यौन शोषण कर रहा था या करना चाहता था... वो लड़की अपना यौनशोषण नहीं होने देने के लिए अपने ही पिता के खिलाफ खड़ी थी। उस आदमी के ही मुखालिफ जो उसे रोटी दे रहा था, जो उसे छत दे रहा था, वो भी बेहद मुखर और स्पष्ट विचार के साथ।
बाल यौन शोषण के विरुध हम बच्चों को जागरूक करने का काम करते हैं। अपने इस अभियान में हम बच्चों को यौन शोषण की स्थिति में चुप नहीं रहकर बोलने, मना करने, ना कहने, निडर रहने और किसी के डर से कुछ नहीं छुपाने की बात सिखाते हैं। इस लड़की ने तो उससे भी दो कदम आगे का रास्ता बता दिया।
ये साहस देश की ज्यादातर पढ़ी लिखी महिलाएं भी नहीं कर पातीं हैं। पर वैचारिक स्पष्टता होनी ऐसी ही चाहिए, अधिकार और सुरक्षा साफ-साफ समझ आना चाहिए। आवाज कहां तक उठाई जा सकती है, ये भी स्पष्ट समझा जाना चाहिए।

1 comment:
very shocking...this is the reality...sexuality can be manifested in many ways...incest is one of them...it ugly and requires public redressal because under the closed door as the relationship has no meaning. these stories make you numb but on the flip side gives you more insight into devil manifestation of human brain...
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