
छत-विछत... या कुत्ते की मौत... बोलना और उसका सही मतलब जानना दोनों अलग बाते हैं। सुबह खराब करने के लिए क्षमा, ये तस्वीरें पुरानी हैं... पर हादसा किसी सुबह का ही है। अखबार में सड़क दुर्घनाओं में मौत की सच्चाई दरअसल ऐसी ही होती है। वो मौतें होती ऐसी ही हैं।
कल कहीं ये तस्वीरें दिखीं तो मन खराब हो गया।
नहीं, नहीं लाशें देख कर नहीं... लाशें ऐसी ही होती हैं, और लाशे सच हैं... कोई भी व्यक्ति लाशों से भाग नहीं सकता है। पर लाशें इस तरह क्यों?
चार बच्चे, एक तो अनजन्म बच्चा, जिसकी पैदाइश ही लाश हो जाने के लिए हुई। चार बच्चे, दो मोटर साइकिल और एक ट्रक या बस...किसी से सिर पर हेलमेट नहीं। सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं।
मोटरसाइकिल डिजाइन ही की जाती है दो लोगों के बैठने के लिए। किसी दूधमुंह बच्चे के सवार होने के लिए उसमें कोई व्यवस्था ही नहीं है। पर हाइवे पर, बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के, एक बाइक पर चार लोग सवार हुए, आपको पूरे देश में दिखेंगे। लोग ऐसी तस्वीरों को भारत की महान संस्कृति का नारे के साथ, बांट-बांट... खुश भी होते मिलेंगे पर उन्हें इस संस्कृति के पीछे छतराई ये लाशे नहीं दिखतीं...
जिस बाइक को सवा सौ किलों के लिए बनाया गया है, उसपर तीन सौ किलो का वजन होगा तो वो कैसे नियंत्रण में रहेगी। सवा सौ किलोग्राम के वजन पर हर बाइक का एक गुरुत्व केंद्र तय किया जाता है CG.. center of gravity... डिजाइन के जितने करीब ये गुरुत्व केंद्र होता बाइक उतना ही नियंत्रित और संतुलित होती है।
पर देश हमारा... चलता है,जैसे चलती हवा,
जैसा बरसता है पानी
जैसे बहती है नदी...
वैसे ही देश हमारा चलता है...
पर इन सबों के चलने के पीछे एक कुदरती कायदा है, सख्ती पालन किया गया भौतिकी का नियम। कुदरत कभी भी विज्ञान से नहीं भटकती है।
पर आदमी को वैज्ञानिक कायदों से कोई सरोकार नहीं...
वो इस्तेमाल करता है विज्ञान पर आधारित चीजें पर इसके लिए टीका और माला पर भरोसा करता है। यहां गाड़ी चलाने आना चाहिए, चलाने मतलब बस चलाने, सड़क पर चलाने आना नहीं, बस चलाने आना चाहिए और लाइसेंस मिल जाता है, गांवो में तो लाइसेंस मिलने की भी जरूरत नहीं होती। कायदे और रूल्स ना तो जानने और सीखने की चीज हैं ना ही पालन करने की चीज।
ट्रैफिक का सम्मान, कायदो का पालन जरूरी नहीं, फालतू के सरकारी बंदिश हैं... ये सोच पूरे समाज का है। सड़क पर करीब-करीब हर वाहन चालक इसी रवैये से चल रहा है। तो चला करे.. फिर जिंदा आदमी ऐसे ही बीच से भुरकुस बन लाशों मे बदलता रहेगा। ठीक-ठाक इंसान दो हिस्सों में ऐसे ही कटता रहेंगा। बच्चे की लाशें, ऐसे पेट फाड़ के सड़क पर छितराई रहेंगी।
देखिए और डरिए कि सड़क पर मरनेवाला हर आदमी, ऐसे ही मरता है।
जिंदगी हमारी है, तो उसका दायित्व सामनेवाले वाहन का नहीं, हमारा है। पर ऐसा होता नहीं है, जिसकी जिंदगी है उसे फिक्र नहीं होती, उसको छोड़. बाकी सबको, उसकी जिंदगी बचाते रहने की कोशिश और फिक करनी चाहिए। भारत में सड़क का यही कायदा है। हर बाइक सवाल और अब तो कार चालक भी ऐसे ही चल रहा है। शहर हो या हाइवे... सब जगह यही नियम लागू है कि कोई नियम लागू नहीं है।
जीवन मिलते ही, मौत की कोशिश मार डालने की होती है। गर्भ से ही... ताउम्र, जबतक मौत मार नहीं डालती, तब तक ऐसा होता रहता है। जिंदा बचे रहने की कोशिश आपको खुद करनी होती है। हर चीज, हर वक्त आपको मार डालने के लिए तैयार मिलेगी। उनसे बचने की जिम्मेवारी आपकी है।
गर्भवती महिला, हाईवे पर, क्यों बाइक पर चढ़ेगी... पर हमारे यहां जीवन की कोई कीमत ही नहीं।सड़क पर लापरवाही के पक्ष में आप जो भी तर्क दीजिए उसका मतलब ये लाशें हैं। लापरवाही की सफाई का मतलब है कि लोगों, बच्चों और औरतों का यही हाल होते रहना चाहिए। जारी रहे इंसानों को कुत्ते की तरह मरते रहना... आमीन।
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