Amitabh Bachchan... लोगों के लिए इस नाम का मतलब एक महान अभिनेता होता होगा। लेकिन मुझे जाननेवालों के लिए अमिताभ बच्चन का मतलब... मैं होता हूं। गलत तो नहीं कहा ना दोस्तों?अमिताभ बच्चन नाम के हाड़मांस के सचमुच के आदमी से सचमुच में मिलने के कई मौके मिले, मुलाकत भी एक फैन की तरह नहीं, कि वो मुझे ऑटोग्राफ दें और मैं मुग्ध सा उन्हें देखता रहूं। हर मौका था, बेहद सम्मानजनक मुलाकात का मौका, जहां वो दाता नहीं होते और मैं याचक नहीं होता।
लेकिन एकदम मेरे निजी वजहों से मैंने ऐसे कई मौके हाथ से जाने दिए। केवल इसलिए कि बचपन से जिस अमिताभ बच्चन को जानता हूं, वो अमिताभ बच्चन हाड़मांस का अमिताभ बच्चन नहीं, रोशनी का अमिताभ बच्चन है।
वो हरिवंश राय बच्चन के सुपुत्र अमिताभ बच्चन नहीं।
वो प्रकाश मेहरा की नजरों से, सलीम खान के सीन में जावेद अख्तर की लिखी लाइनें... बोलने वाला अमिताभ बच्चन हैं। वो मनमोहन देसाई के सीन में, महमूद भाई के सिखाए भाव-भंगिमा अपना कर, सचिन भौमिक की लिखी लाइनों को कादर खान के अंदाज और लहजे में बोलने वाला अमिताभ बच्चन है। वो प्रकाश मेहरा, एन सिप्पी, यश चोपड़ा.. और भी कितने निर्देशकों के नजरिए से, कादर खान के लिखे, कादरखान के ही लहजे में लाइने बोलनेवाला अमिताभ बच्चन है।
जिसने पैर और हाथों में महमूद भाई, भगवान दादा के लय का साफ असर और प्रभाव है। जो कादर खान की मदद से दिलीप कुमार की तरह आधी लाईने मुंह में ही चबा जाता है। जो मोतीलाल और बलराज साहनी की तरह सहज रहने की कोशिश करता रहता है। जिसकी दुबली-पतली बांहों में एमएस शेट्टी( रोहित शेट्टी के पिता) की करामात से इतनी ताकत आती है कि वो दस लोगों को चित कर दे। मैं उस अमिताभ बच्चन को जानता हूं, जो अकेला नहीं, एक भीड़ है।
वो अकेला है तो उसका कोई अर्थ नहीं...!
अमिताभ बच्चन से मिलने के लिए मुझे इतने लोगों से एक साथ मिलना पड़ेगा। ऐसी मुलाकात की सही जगह, उस अंधेरे कमरे का चमकता पर्दा ही है। अगर कहीं मैं इनलोगों के बिना अमिताभ बच्चन से मिलता हूं, तो मैंने बचपन से जिस अमिताभ बच्चन को मन में बसाया हुआ है, वो एक झटके में छिन जाएगा, लुट जाउंगा मैं तो। अमिताभ बच्चन का कुछ नहीं बिगड़ेगा, मेरी दुनिया, मेरे सपने तबाह हो जाएगे। सो नहीं मिला अमिताभ बच्चन से।
मुझे नहीं मालूम कि मैं ये क्यों कर रहा हूं...
लेकिन मुझे लग रहा है कि मुझे ये बात आज ही कहनी चाहिए तो कह देना जरूरी है कि पता नहीं ये स्थिति फिर कभी मुमकिन हो या नहीं।
बेशक, वो अदभुत इंसान होंगे। लेकिन उनके लिए, जिनके साथ वो काम करते हैं। वो बेहतर सहयोगी होंगे, लेकिन अपने सह अभिनेताओं के लिए। वो बेहतर और सहज अभिनेता होंगे, लेकिन अपने निर्देशकों के लिए, जिन्हें उनसे काम लेना आसान लगता होगा। इस जीवन में कभी मौका मिले उनके साथ काम करने का (जो कि अब नामुमकिन ही है) तो शायद मैं उन्हें एक व्यक्ति के रूप में जानना चाहूंगा कि मुझे तब अमिताभ बच्चन नाम के व्यक्ति के साथ काम करना पड़ेगा। जो अब संभव नहीं दीखता। तो जिस अमिताभ बच्चन से मुलाकात जरूरी नहीं उससे मिलने की जरूरत ही क्या, सो मैं नहीं मिल पाया उनसे।
मैं उन्हें पर्दे के उस तरफ से नहीं जानता, एक दर्शक के तौर पर उन्हें पर्दे पर जानता हूं, जिसमें वो निर्देशक के दिमाग से दिखते और बोलते हैं। लेकिन मैं जिस अमिताभ बच्चन को जानता हूं, वो मुमकिन हाड़मांस के एक व्यक्ति के चलते हो पाया। वो व्यक्ति, आज ही पैदा हुआ है, तो ये मेरे लिए जश्न की बात है।
मुझे कभी अमिताभ बच्चन की शिद्दत से जरूरत होगी तो, वो मुझे मिल ही जाएंगे। लेकिन तब वो, इस तरह हाड़मांस का जीवित व्यक्ति नहीं होगा। पर्दे पर वो मेरा अमिताभ बच्चन(भीड़वाला अमिताभ बच्चन) ही दिखेगा, लेकिन उस तरह का कोई जीवित व्यक्ति होगा नहीं। हम उसे गढ़ लेंगे। मेरा अमिताभ बच्चन, बिना सचमुच के हाड़मांस के अमिताभ बच्चन की जरूरत के, पर्दे पर दिखेगा। बाकी सारी चीजें वैसी हीं होगी, जैसी अभी है। अगर मुझे अमिताभ बच्चन की जरूरत पड़ी तो...
मैं अगर मिलना चाहूंगा... तो मिलना चाहूंगा,
बलू से, बगीरा से, ऐस्ट्रिक्स से, ओबेलिक्स से, टीमोन और पुंबा, मुफासा से, फैंटम से, बहादुर से, मोटू और पतलू से, घसीटाराम और डॉक्टर झटका से, मिस्टर बीन से, बिल्लू से, डब्बू जी से, चीकू से, डाकूपान सिंह से, छोटू और लंबू से, राजन-इकबाल से, 007 जेम्सबांड से... मैं मिलना चाहूंगा, सिंड्रेला से, बुद्धिमती वासिलीसा से
लेकिन ये किरदार सचमुच में हैं कहां? जो इनसे मिला जाए। तो विजय दीनानाथ चौहान भी सचमुच में कहां हैं!
लेकिन कादरखान के लहजे में संवाद बोलनेवाला, महमूद और भगवान दादा की तरह मुंह बनानेवाला और मोतीलाल और दिलीप कुमार की तरह सहज दिखनेवाला विजय... सामने दिखा... हाड़मांस के एक व्यक्ति की वजह से... जिसका नाम अमिताभ बच्चन है। इस आदमी की महानता बस इतनी है कि इसने दधीचि की तरह अपनी हड्डी दान कर दी, और काबिल लोगों की भीड़ ने उसे वज्र बना दिया, अपराजेय वज्र।
अब वज्र के बनने में हड्डी का योगदान बेशक ही महान है। वो महानता है इस हड्डी की उदारता, उसकी लचक कि वो काबिल लोगों की भीड़ के कहने के मुताबिक बहता गया करता गया, बिना कोई ईगो फंसाए। मेरा अमिताभ बच्चन... वहीं अमिताभ बच्चन हैं... सबकी मेहनत से बना वज्र।
तो इस वज्र के लिए अपनी हड्डी दान करनेवाले महादानी दधीचि को मेरा सादर चरणस्पर्श है।
उनके जन्मदिन पर उनके सेहतमंद रहने की शुभकामनाएं हैं।
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