Friday, November 6, 2015

ये हत्या... सामूहिक अपराध है !



क्या वो पत्रकार थे इसलिए उनकी जान गई?
अब यहां पत्रकारों की जान नहीं जाती
, वो करोड़ों के मकान में रहते हैं, करोड़ों की गाड़ियों में घूमते हैं। तो वो पत्रकार नहीं थे।

उन्हें पुलिस ने मार डाला?

नहीं पुलिस की मार से गुड़ों की जान तो जाती ही नहीं, एक आम आदमी की जान कैसे जाएगी! उनकी जान पुलिस ने नहीं ली... ये आरोप झूठा है !

वो सच का साथ देते थे
, इसलिए उन्हें जीवित रहने नहीं दिया गया?
हां... यही बात है
, पुलिस... उस दोगले समाज का हिस्सा है, उस समाज का, जिसके पतन का कोई अंत नहीं। उनकी मौत, निराशा, हताशा से हुई। एक सभ्य, सच्चे आदमी की मौत, बस इतने से हो सकती है कि सच्चे काम के लिए कोई उसे थाने में बिठा भर ले। कोई कॉलर पकड़ ले उसका। कोई गाली दे दे उसे।

उसे एकदम समझ नहीं आता कि वो तो वही काम कर रहा है
, जो इस समाज की जरूरत है, फिर ऐसे काम करने की सजा उसे क्यों मिल रही?  इसका कोई जवाब नहीं इस समाज के पास। झूठ के लिए जान देनेवाले समाज के पास कोई जवाब नहीं कि सच्चे होने के पर किसी का अपमान क्यों किया गया?


अब आप सच और झूठ, और अपना-अपना सच का चुतियापा मत कीजिएगा। सच केवल सच होता है, वो व्यक्ति के मुताबिक बदलता नहीं। व्यक्ति का उसके प्रति अनुभव अलग हो सकता है, वो व्यक्ति का दोष है, सच का चरित्र नहीं।

23 डिग्री सेंट्रीग्रेड
, किसी व्यक्ति के लिए ठंडा है, तो किसी व्यक्ति के लिए गरम। ये व्यक्ति से तय है कि वो ठंडा है या गरम। सच यह है कि तापमान 23डिग्री सेंटीग्रेड है।

एक सच्चे और गैर-राजनीतिक व्यक्ति को कभी समझ नहीं आता कि समाज ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है... बस इतने से उसकी मौत हो जाती है। दुनिया उसे गैरजरूरी समझती है
, और वो दुनिया को खुद के लिए गैरजरूरी समझ लेता है। बस दुनिया से रिश्ता खत्म।

तो ये नुकसान उस व्यक्ति का नहीं
, दुनिया का हो रहा है। ये मृत्यु, निष्ठा.. बेहतरी के लिए लड़ी जानेवाली लड़ाई में निराशाजनक पराजय है!  

आपको क्या लगता है प्रलय क्यों आता है
? वो आता नहीं, उसके आने की परिस्थितियां ये समाज खुद रचता है। वो... हर उस व्यक्ति, चीज, जगह को खत्म कर डालता है, जो प्रलय की संभावनाओं के विरुद्ध काम करते हैं। उसे टाले रखते हैं। ऐसा करके ही समाज प्रलय की परिस्थिति पैदा कर लेता है, और प्रलय आ जाता है।


स्वर्गीय राजीव चतुर्वेदी की हत्या...
हां
, उनकी हत्या हुई है, ये हत्या पुलिस, उनके समुदाय, उनसे रिश्तेदार और साथियों ने मिलकर की है। तो ये हत्या उनकी नहीं, समाज की अपनी आत्महत्या की लंबी प्रक्रिया की तरफ बढ़ा एक और कदम है।

मुझे एकदम समझ नहीं आता कि जो व्यक्ति, समाज के लिए लड़ रहा हो
, वो थाने अकेले क्यों जाएगा? वो अकेला होगा ही क्यों? उसे अकेला क्यों छोड़ा गया? छोड़ा जाता ही क्यों है?  

एक टुच्चा नेता, अपने साथ फौज लेकर चलता है
, क्योंकि उसकी सेना में शामिल लोग, लूटेरे होते हैं, और नेता उन्हें इसकी सुविधा देता है। एक व्यक्ति, जो समाज के लिए सचमुच की लड़ाई लड़ रहा, वो भी तो समाज के अच्छे लोगों के लिए, उसी नेता की तरह अच्छाई की सुविधा बना रहा है। लेकिन नेता की तरह उसके साथ भीड़ क्यों नहीं? वो सिर्फ इसलिए कि ये दुनिया लूटेरों की भीड़ है। अगर लूट में लाभ नहीं उनको, तो वो आपके साथ नहीं।

वर्ना उनके
 थाने में हाजरी देने से पहले, इसकी साजिश रचनेवाला... खत्म हो चुका होता । लेकिन 'अच्छे लोग' ऐसा नहीं करते... वो केवल बलि देते हैं... और शहादत लेते हैं।

ये मौत स्वर्गीय राजीव चतुर्वेदी की नहीं
, इस समाज की चेतना की मौत की प्रक्रिया है।
 

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