इस
बार बिहार चुनाव में लालू प्रसाद जी की दशा कुछ ठीक नहीं है। निराशाजनक है।
एकदम
आरजेडी के चुनावी सामर्थ्य पर मत जाईए। जिंदगी चुनाव नहीं है। लेकिन चुनाव के लिए
भी जिंदगी जरूरी है,
जिंदा रहना जरूरी है। तो मेरा तात्पर्य उनकी राजनीतिक हालत से नहीं,
शारीरिक स्वास्थ्य से है। लालू प्रसाद जी की उम्र बस 67 साल है,
लेकिन वो दिखने में 80-85 साल के लग रहे हैं। बहुत ही बूढ़े और भासे
हुए, बहके हुए से...दिग-भ्रमित। उनका हास्यबोध भी अब खत्म हो
गया है। ये स्थिति एक विचित्र खालीपन ले आएगा... तीस बरसों से लालू जी के साथ जीने
की आदत पड़ गई है, तो
उनका नहीं होना विचित्र खालीपन ले आएगा।
आपने
कभी कोई लाश देखी है?
ढकी हुई नहीं, सामने से, जिसका एकदम चेहरा खुला हुआ हो? दुनिया का कोई भी अभिनेता, लाश का अभिनय नहीं कर
सकता है। केवल जीवन की मौजूदगी हो आपके शरीर में, और आप जीवन
रहित होने का अभिनय तक नहीं कर सकते हैं। लेकिन आपके शरीर से जीवन साथ छोड़ रहा है,
इसका साफ संकेत आप देख सकते हैं। आत्ममुग्धता में भले आपको दिखाई ना
दे लेकिन आपसे इतर ये देखा जा सकता कि कैसे एक जीवित व्यक्ति, धीरे-धीरे लाश में बदल रहा है। आप किसी ऐसे बीमार व्यक्ति से मिलिए जिसका
मरना तय हो चुका है, तो आप इसे साफ-साफ महसूस कर पाएंगे। तो लालू
मर रहे हैं... वो लाश में बदल रहे हैं, बहुत तेजी से...
पिछले
दस बरसों से उनकी राजनीतिक निस्क्रियता से बड़ा नुकसान हुआ है, वैसे उनकी राजनीतिक सक्रियता से भी कोई कम नुकसान नहीं हुआ। मतलब कि लालू
प्रसाद दी हों... तो नुकसानदेह हैं, ना हों... तो भी। वो
दोनों ही स्थिति में नुकसानदेह हैं, फिर भी उनके होने का कुछ
लाभ तो हुआ ही है।
लालू
जी की अनुपस्थिति से राजनीति पटल से हास्यबोध गायब हो गया है और केवल जहर रह गया
है।
दबे-कुचलों
को जुबान,
बिहारी खान-पान
बिहारी लहजे को सम्मान,
चोर-लुटेरों का कल्याण...
...जैसे कई और भी लाभ हैं जो लालू जी की सक्रियता से मुमकिन हो पाए हैं... ये बात दीगर है कि इस लाभ की समाज को भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
-तो
लालू जी तेजी से बूढ़े हो रहे हैं... नहीं क्या? पर क्यों?
वैसे
कई बार बिना बूढ़ा हुए भी लोग, लाश बनने की तरफ भागने लगते हैं मैंने सवाल किया कि क्यों वो ऐसा दिख रहे या हो रहे हैं? तो भैया ने समझाया...
लालू
प्रसाद के बूढ़े होने और बेहद तेजी से बूढ़े होने में... उनकी अनुवांशिकता का हाथ
है। उनका बुरा हाल करने में उनके ही खून का हाथ है। उनकी ही धमनियों में बहनेवाला
रक्त उनकी हत्या कर रहा है। दरअसल वो अपने ग्वार (ग्वाला) होने की सजा भोग रहे
हैं। लालू जी जिस जिनेटिक कोड के हैं, वो जींस ही
स्टार्व्ड, भूखे लोगों की जीन्स है। उनकी अनुवांशिकता ही
भूखमरी की है। (भूखी अनुवांशिकता गाली नहीं, एक खास तरह की
जिनेटिक खासियत है।)
स्टार्व्ड
जिनेटिक कोड मतलब वैसी अनुवांशिकता से है, जो कम भोजन और उसमें भी कम पौष्टिकता
वाले भोजन से ही जीने का हुनर सीखी होती है। गांव के खेतिहर लोगों की जींस ऐसी ही
है। पीढ़ियों से उनके बदन को कम खाने और ज्यादा काम करने की आदत होती है, कम भोजन में भी ज्यादा ऊर्जा बना सकने का ये हुनर उनके अनुवांशिकी में आ
जाती है। फिर वो एक खास हुनरवाले व्यक्तियों में विकसित हो जाते हैं। लालू प्रसाद
की अनुवांशिकी वैसी थी जिसमें कम और पौष्टिकता रहित भोजन और ज्यादा मेहनत करने का
नियम था।
राजनीति में आने के और साहेब हो जाने के बाद... उनके भोजन का तौर तरीका और जीवन शैली निश्चित ही वैसी नहीं रही. जो उनके पूर्वजों की थी। लालू जी के लिए, उनके पूर्वजों ने जिस तरह के जिनेटिक प्रोग्राम विकसित किया था, लालू जी की नई जीवन शैली ने, उसका पूरा इस्तेमाल ही बदल दिया।
नतीजा
तो होगा कि शरीर अजीब व्यवहार करने लगेगा और सही तरीके से काम नहीं करेगा, असर कोशिकाओं और उत्तकों पर भी होगा। लालू प्रसाद जी इसी के शिकार हो गए
हैं। वो तेजी से बूढ़े हो गए। शरीर गड़बड़ा गया। उत्तक, कोशिकाएं, धमनियां सारी... चर्बियों से लद गईं और वो मरने की स्थिति में पहुंच गए
हैं। वर्ना उनके ही भाई सरकारी नौकरी से रिटायर हुए हैं, वो
उनसे बड़े हैं, फिर भी उनसे ज्यादा तंदुरुस्त और सेहतमंद दिख रहे हैं।
लालू
जी जिस जेनेटिक कोड के हैं, उसमें तनाव लेने की आदत नहीं है। वो भोले लोगों का
जेनेटिक कोड था,
जो मेहनतकश और मस्त रहने वाला जींस था। लेकिन लालू जी ने शारीरिक
मेहनत से मस्त रहने के अपने जेनेटिक गुण की ऐसी तैसी कर ली। अब ऐसा करने पर उसकी
कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।
कुदरत
भोले लोगों के प्रति सहानुभूति रखती है। वो चालाक लोगों से भी सहानुभूति रखती है
लेकिन मूर्ख लोगों से उसे बड़ी परेशानी होती है। उनके प्रति वो एकदम ही निष्ठुर
होती है। भोलापन अगर चालाकी भरी हो तो वही मूर्खता है। वो भोले लोग, जो चालाक बन रहे है, दरअसल मूर्ख हैं।
हम
लोग भी, लालू जी की तरह की अनुवांशिकी वाले हैं, स्टार्व्ड
अनुवांशिकी वाले लोग।
गांव से आए हम लोगों के साथ भी वैसा ही हो रहा है - भैया बोलते जा रहे थे, और सही बोल रहे थे।
गांव से आए हम लोगों के साथ भी वैसा ही हो रहा है - भैया बोलते जा रहे थे, और सही बोल रहे थे।
हमारे
बाबा दिन में चार बार एकदम निश्चित समय पर बेहद कम घी, मसाला और चीनीरहित भोजन करते थे। रोजाना का नियम था, घड़ी की तरह थे। फिर पूरे दिन शारीरिक श्रम ही करते रहते थे। रोजाना हर
खेत की मेड़ पर एक नजर दौडा आते मतलब दस से बारह किलोमीटर पैदल चल लेते, वो भी लपककर, तेजी से। फिर खेती से जुड़े दूसरे काम भी करते। जितनी उर्जा
की खाते थे, शरीर से उससे ज्यादा उर्जा निकाल देते। खून नसों
में थमा या जमा नहीं रहता, दौड़ता रहता। नजीतन नब्बे साल तक
एकदम तंदुरुस्त और होशोहवाश में रहे। वही बात बाबूजी में भी थी, उन्होने खेती का काम छोड़ दिया लेकिन खाने के मामले में बंधन, परहेज और
शारीरिक मेहनत उन्होंने से भी जारी रखी। तो वो भी नब्बे साल तक स्वस्थ रहे।
पर
गांव के खेत-खलिहान छोड़,
शहर की कुर्सियों पर आसीन होने की महानता कर रहे हमलोग, दरअसल मर
रहे हैं, लालू जी की तरह ही, बहुत ही
तेजी से हमारे जीवन का ह्रास हो रहा, हमारी मौत हो रही
है।
हम
मर रहे हैं... एक पूरी संस्कृति, मेहनत के बूते जीने की पूरी संस्कृति हमारी,
हमारे साथ ही खत्म हो
जाएगी। अपनी अनुवांशिकता बदलकर, अपने खून से ही हम अपने पुरखों के मेहनतकश होने के
सबूत मिटा देंगे। हमारे बच्चे और उनके बच्चों के गुणसूत्र, जीन्स
धीरे-धीरे इस नई परिस्थिति के मुताबिक ढल जाएंगे। वो सीख लेंगे कि ज्यादा ऊर्जा
लेकर लेकिन कम उर्जा खर्च करके कैसे लंबे वक्त तक जिंदा रहा जा सकता है। ये अलग
बात है कि इसमें काफी समय लगेगा।
तबतक
हम नई बीमारियों की एक पूरी खेप अपने बच्चों में बो चुके होंगे और वो हमारी करतूत
की कीमत चुकाते पीढ़िया बिता देंगे।

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