इस कूड़े का निर्माता व्यक्ति सेंसर करने का काम करता है। अपने मालिक की शान में भी जो ऐसे चूतियापे भरे और वाहियात प्रोडक्शन वैल्यू की फिल्म बनाता है वो आदमी हमारे देश में सेंसर करने की जिम्मेदारी निभाता है।
वीडियो में क्या दिखाया गया है, उसकी तो बात ही नहीं कर रहा। वो कैसे और किस तरह दिखाया गया है, मेरा क्षोभ तो उससे ही शुरू हो गया। किसी टूच्चे से मीडिया स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी इससे बढ़िया वीडियो बना लेते हैं आजकल । ये महान पदों पर बैठे महान लोग, दरअसल देश की जनता और सरकार... सबको मूर्ख बना रहे हैं।
देश का गुणगान करना है और उसका ब्रांड एम्बैसडर हैं - निरहुआ और खेसारीलाल। ये तो स्तर है हमारा । भोजपूरी के इन दोनों अभिनेताओं की फिल्मों के गाने सुनिए... अश्लीलता और दोहरे अर्थ से भरे पड़े है । विचित्र है कि यही वो सेंसरवाला है जिसे दोअर्थी बातों से परहेज है। जिस आदमी को भारतीय संस्कार की इतनी फिक्र है कि वो अश्लील लगनेवाले किसी भी संवाद को सेंसर करने का फतवा जारी करता है, वही आदमी सबसे अश्लील गाना गानेवालों को अपनी फिल्म में, भारत की गाथा गाने के लिए चुनता है। ये विडंबना नहीं, देश को चूतिया बनाने की चालाकी है।
संयोग या चालाकी ये भी है... कि ये दोनों ही यादव है...दिनेश लाल यादव निरहुआ और खेसारीलाल यादव। ये फिल्म सिनेमा हॉल में इंटरवल के वक्त दिखाई जा रही है। हिन्दी सिनेमा के इंटरवल में, हिन्दी पट्टी में...मतलब उत्तर प्रदेश में, यादवों के हाथों मोदी का गुणगान । तैयारी यूपी चुनाव की है, लेकिन फिर वही... जनता को चूतिया बनाते हुए।
गुणवत्ता एकदम सड़ियल है... गाने, संगीत और वीडियो का पूरा निर्माण दोयम दर्जे भी नहीं, स्तरहीन है। अपने देश के बारे कोई फिल्म बने तो मैं उसे भारतबाला की तरह की फिल्म देखना चाहूंगा। 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' जैसा या रहमान का म्यूजिक वीडियो - 'वंदे मातरम्' जैसा। ये स्तरहीन चापलूस लोग, हमारी कला का स्तर जमीन में गाड़ देने की पूरजोर कोशिश में हैं।
फिल्म के कंन्टेंट के बारे में तो चर्चा हो रही है कि दिखाई गई दस उपलब्धियां झूठ हैं और वो इस देश की हैं भी नहीं। पूरा सीरीज है इसका... लिंक है यहां, जानने के लिए क्लिक कीजिए -
वीडियो के झूठ का हिसाब यहां लिया गया है
झूठ... इतनी बेशर्मी से क्यों बोला जाना चाहिए? ये जानते हुए कि वो झूठ है लोग बोल कैसे लेते हैं और फिर उसका बचाव भी कैसे कर सकते हैं?
उन्हें लगता है कि जनता मूर्ख ही है, एकदम निपट मूर्ख... अंधी। नाक, कान, आंखें सब खराब है उसके, या हैं ही नहीं।उसे जो चाहे चूतिया बना लेगा। वैसे इन लोगों का दोष नहीं! हो तो ऐसा ही रहा है इस देश में.. और जम कर हो रहा है।
लानत है!
कि ये आदमी सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष है।सोचिए, वो हमारी फिल्मों की क्या दशा करेगा। फिल्में, वक्त का इतिहास होती हैं। साहित्य की तरह, उन्हें मुक्त और खुलकर सच बोलने का अख्तियार होना चाहिए। वर्ना आने वाली पीढ़िया हमारे वक्त के इन दस्तावेजों और उनके बारे में किए गए हमारे फैसलों का मजाक उड़ाएंगी।उन्हें हम पर गर्व होना चाहिए, पर वो शर्मिंदा होंगी हमारी मूर्खताओं से।

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