Thursday, November 19, 2015

पार्टियां तो टूटती ही हैं...



 

इसे राजनीतिक दूरदर्शिता नहीं, दिमाग का फितूर और बकवास समझा जाए... जिसका तथ्यों और वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं...
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राजनीति विचित्र है...
यहां महल बनाने से ज्यादा मजा, कब्र खोजने में आता है। एक व्यक्ति को लगता है कि वो महान है, कि कोई दूसरा व्यक्ति उसकी कब्र खोद, उसे दफना देने का काम करने लगता है। अब कमाल है कि यहां महानता भी किसी की चिता में आग देने से ही आती है। विचित्र बात ये भी है कि यहां चिता में जला दिए गए लोग, भूत की तरह वापस आ जाते हैं और महान लोगों के सिर पर नाचने लगते हैं। जिनकी सारी महानता उस भूत नाच के गायब होने लगती है।

नीतीश जी ने अपने शपथग्रहण में जूनियर ठाकरे को आमंत्रण दिया है  तो सीनियर आडवाणी जी भी आमंत्रित हैं। एकदम मामूली बात है, नहीं क्या?

ये ऐसा है कि महान मसीहा, अचानक से इंसान निकल गया तो भक्तों का उस पर विश्वास डिगने लगा। वो जमकर मुखर हो उठे कि ये तो मसीहा है ही नहीं। अब होता ये है कि हर सांसद, दोबारा चुनाव जीतना चाहता है,  किसी मसीहा नेता में उस सांसद को दोबारा जितवा सकने का चमत्कारी शक्ति खत्म होती दिखेगी तो चमत्कार को नमस्कार करनेवाला सांसद फौरन से बागी हो जाएगा।

बागियों की संख्या ज्यादा हो, तो उन्हें असंतुष्ट कहते हैं। असंतुष्टों की संख्या ज्यादा हो, तो वे असंतुष्ट नहीं रहते, अलग विचारधारा हो जाते हैं। फिर पार्टी टूट जाती है। इसके पहले भी कांग्रेस, जनता पार्टी, और जनता दल वगैरह में टूट तो हुई ही है। पार्टी के टूटने से सरकार गिर जाती है, प्रधानमंत्री बदल जाता है। बीच में ही चुनाव करवाने की नौबत आती है।

व्यक्ति बस अपनी ही छवि केलिए, केवल अपने ही बूते सारे फैसले लेने की कोशिश करे... तो ध्यान रखे कि...ये एक व्यक्ति नहीं, सवा अरब लोगों का देश है। उसका तरीका, प्रजातंत्र नहीं; तानाशाही का चरित्र है। प्रजातंत्र शासित किसी देश में, ऐसे आचरण पर अंकुश के लिए पर्याप्त संभावना और गुंजाइश होती है।

इसके पहले भी महत्वाकांक्षी हितों और लोगों के टकराव से पार्टियां टूटी हैं और स्पष्ट बहुतम की सरकार, अल्पमत में आ गई। एक ही लोकसभा में दो से तीन प्रधानमंत्री बदले हैं।

राजनीति में चमत्कार स्थाई नहीं होता है।धमाके से चमकने के बदले, जो लोग धीमे बढ़ते हैं, वही ज्यादा ऊपर चढ़ते हैं।

बीजेपी में बहुत लोग हैं, जो काबिल होने के बाद भी किनारे किये गये हैं। उन्हें अहमियत नहीं दी गई, क्योंकि वो अपने विवेक का इस्तेमाल कर लेंगे। निरंकुशता को दूसरे के विवेक से परहेज होता है, सो वो मूर्खों की फौज बना, उससे चारों तरफ घिरी रहती है, और ऐसा कर पाने कि अपनी इस कामयाबी पर खुश होती है। विवेक अपनी अनदेखी को नजरअंदाज तो कर सकता है, उसे हमेशा के लिए टाल नहीं पाता और परिस्थितियां बदलते ही, वो 'कोशिश' करता है।

 
भारी बहुमत मोदी जी को मिला था, पर सरकार बीजेपी की है... और पाटियां टूटती है। इस टूटन के लिए दरार शुरू से ही होती है बस किसी को उसमें कील्ला ठोंकने की जरूरत है।  

'महान', महोदय ने भुकभुकाकर, बुझ रही लालटेन में तेल-बत्ती डाल, लालू जी की लाश में जान फूंक दी। अंतिम क्रियाकर्म हो चुका था जिस कांग्रेस था, उसको चिता से जिंदा कर दिया। व्यक्तिवादी रवैये से क्षुब्ध.. अपने ही लोग बागी हुए पड़े हैं। शिव सेना तो शिवसेना, खुद अपनी ही पार्टी के सांसद और विधायक मुखर विरोध को विवश हो गए।

बिहार के बाढ़ के घाघ कुमार की व्यवस्था देखिए... गोपालगंज का गोप... बेताल की तरफ उनकी पीठ पर सवार ना हों इसके लिए वो 'अयोग्य' आडवाणी और 'ठूंठ' ठाकरे साहब के साथ हैं... कि लार टपकाते 'लालची' लालू को समझ आए कि उसके विरुद्ध कभी भी बीजेपी से मिल, सरकार बनाई जा सकती है। जैसे बीजेपी के विरुद्ध आरजेडी से मिल सरकार बना ली गई थी। तो लालू जी ये साफ समझ जाएं कि ये रास्ता बंद नहीं हुआ है, खुला है।

दोस्त का दोस्त... दोस्त.
दुश्मन का दोस्त... दुश्मन.
अभी दोस्त... कभी दुश्मन.
कभी दोस्त... अभी दुश्मन.

राजनीति... बस अपना मौका बनाए रखने और उसका उपाय किए रहने को कहते हैं... हर व्यक्ति यहां, यही कर रहा है। तो जो भी हो रहा है, सब ठीक ही है। जनता की भी यही जरूरत है। उसकी यही चाह तो है ही, वो इसी लायक है भी।




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