उसी वक्त तय था जब ये
सामने आया कि ये आदमी इतना अहंकारी है। तो उसका हिसाब तो वक्त जरूर लेगा।
दस साल पहले... पीटर
मुखर्जी देश के ताकतवर लोगों में शुमार थे। आखिर स्टार इंडिया के मुखिया जो थे। एनडीटीवी
के सामंतवाद से मुक्त हुए स्टार न्यूज के पहले मुखिया थे, श्री संजय पुगलिया। स्टार
न्यूज के संपादक और सीईओ के नाते, स्टार न्यूज को प्रसारण लाइसेंस दिलाने में उनकी
बड़ी भूमिका थी। सरकार से उनका रिश्ता अच्छा था। वैसे सरकार का काम करने का अपना
तरीका है। मंत्रालयों का तो और भी...विचित्र तरीका है। सो हर हफ्ते लगता था कि
अगले हफ्ते से चैनल ऑफ-एयर हो जाएगा, बंद हो जाएगा। खैर लाइसेंस मिल गया, और देश
में समाचार चैनलों का पूरा स्वरूप ही बदल गया।
उसी स्टार न्यूज में
स्टार इंडिया ने अपनी हिस्सेदारी आनंद बाजार पत्रिका को बेच दी। पिछले हफ्ते ही
सरकार ने न्यूज चैनल्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 49 फीसदी तक बढ़ा देने की छूट
दी है। बारह साल पहले और पिछले हफ्ते तक ये 26 फीसदी ही था, इसी से लाइसेंस मिलने में बहुत दिक्कत हो
रही थी। एक भारतीय और बेहद पुरानी प्रतिष्ठित कंपनी को विदेशी चैलन पर कब्जा मिल
सकने की, घुमाफिरा के यही वजह भी थी। लेकिन एफडीआई 49 फीसदी करने के सरकारी फैसले
के बाद अब ये कतई मुमकिन नहीं होगा।
स्टार इंडिया ने स्टार
न्यूज में अपना अधिकार कम करके, आनंद बाजार पत्रिका को देना शुरू किया। स्टार न्यूज
की व्यवस्थापक टीम में फेर-बदल किया जा रहा था। इस टीम में आनंद बाजार पत्रिका के
मालिक श्री अवीक सरकार के करीबी और पसंदीदा लोग लाए जा रहे थे। मुखिया के तौर पर
आनेवालों में भारतीय मीडिया के महाबुलंद सितारे उदय शंकर थे। संजय पुगलिया का
इस्तेमाल हो चुका था, नई व्यवस्था उन्हें बेकार तो नहीं कह सकती थी लेकिन उन्हें
किनारे कर रही थी। शंकर और पुगलिया दो अलग अलग दिशाओं के लोग थे।
एक दिन स्टार न्यूज
के कॉन्फ्रेंस हॉल में सारे पत्रकार क्लर्कों को हांक, जमा किया गया। सभा उदय शंकर
और दफ्तर के कर्मचारियों के बीच आधिकारिक परिचय और जान पहचान के लिए बुलाई गई थी।
उस सभा में संजय पुगलिया और उदय शंकर, दो तलवारें, एक म्यान की तरफ मौजूद थे ही,
पीटर मुखर्जी भी उपस्थित थे। उन्हें स्वागत भाषण देना था, जो उन्होंने दिया। पीटर
ने कहा कि “उदय
शंकर आज से मुंबई में रह कर संपादकीय जिम्मेदारी उठाने की महान भूमिका निभाएंगे,
जबकि संजय पुगलिया दिल्ली से इस हफ्ते होनेवाले चुनाव का विश्लेषण और एंकरिंग
करेंगे। हम उनका भद्दा और गंदा चेहरा फिर से टीवी पर देखने को मजबूर और बदकिस्मत
होंगे। We would be unfortunate to see his dirty face on TV screen.”
(ये बोलना जरूरी तो था नहीं, लेकिन श्री संजय पुगलिया को भरी सभा में अपमानित करने के लिए पीटर साहेब ने ऐसा कहा। अपमान... सार्वजनिक अपमान... जिसका होता है, उससे ज्यादा, जो ऐसा करता है, उसका चारित्रिक दोष है।
पीटर मुखर्जी के इस
आचरण से ही लग गया था कि ये आदमी जरूर किसी दिन बड़े गड्डे में गिरेगा। आज पीटर पुलिस
से घिरे बदहवास, चलते हुए दिखते हैं तो बड़ा अजीब लगता है कि इस आदमी को समझना तो
चाहिए था उस सभाकक्ष में... कि ये रवैया कभी, ऐसा दिन भी दिखलाएगा।
कारपोरेट दुनिया में
ही नहीं, राजनीति, साहित्य, और सचमुच की दुनिया में भी, सोशल मीडिया में तो और भी
ज्यादा जानबूझकर, सोच-समझकर दूसरों का खूब अपमान किया जाता है। बेजोड़ बात है कि
लोगों को लगता है कि इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। तो बच तो ‘पीटर मुखर्जी’ नहीं पाए... लौंडों
और लुहेरों की क्या औकात है।
ऐसे लोग पीटर से सबक लें कि रवैये और आचरण से उत्पन्न हुए कर्म का फल तो मिलता ही है... कुदरत वो फल हमपर किसी भी रूप में, किसी भी जरिए थोप सकती है... खूबसूरत औरत के जरिए और रूप में भी।

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