Saturday, November 7, 2015

फेसबुक की सड़ांध !


मैं फेसबुक पर नहीं हूं...
पर आपसे मित्रता खत्म नहीं होनी है, इसी से इसे मिटाया नहीं जा सकता। आपसे जुड़े रहने का इकलौता तरीका यही है। वर्ना हम में से हर किसी के फोन में कम-से-कम चार सौ नंबर तो होंगे ही, किसी-किसी के फोन में तो 1000 भी हो सकते हैं। लेकिन कहां बात कर पाते हम, फोन के कॉन्टैक्ट लिस्ट में से हर किसी से। पर यहां फेसबुक पर ये आसानी से हो जाता है।  


इस मित्र सूची में भी कुछ लोग सचमुच के मित्र हैं,  सचमुच के से तात्पर्य है कि वैसे मित्र जो आपको सम्पूर्णता में स्वीकार करते हैं। आपकी विविधता उनको कबूल है, आपका हर पहलू उनके लिए सहज बात है। कि वो वक्त ले... आपके साथ हैं। आपकी अच्छी भाषा, आपकी बुरी भाषा, आपकी गाली, आपका भजन... आपकी बौधिकता और आपकी मूर्खता... सब देखते रहने के बाद वो आखिरकार आपके साथ रहने का फैसला करते हैं... तो सचमुच के मित्र वही हैं।

कुछ ऐसे हैं, जिन्होने बस आवेश में आ मित्र निवेदन भेज दिया, आपने स्वीकार कर लिया और वो भूल भी गए कि उनसे आपकी मित्रता है। दरअसल उन्हें मित्र की जरूरत नहीं थी। वो बाजार के ग्राहक की तरह हैं, जिसे हर आकर्षक चीज खरीद लेनी है, चाहे वो उसकी जरूरत हो या नहीं। ऐसे लोग भी तो मित्र हो ही जाते हैं. काफी छंटाई के बाद, ऐसे मित्र अब भी हैं ही। वो हैं... क्योंकि ऐसे लोग दरअसल समाज में मौजूद हैं।  तो वो समाज में मौजूद, हर रिश्ते में होंगे, चाहें आप कुछ भी कर लें।

आभासी रिश्तों का असर, अक्सर वास्तविक रिश्तों पर पड़ने लगता है, और ये असर जमकर पड़ने लगता है। फेसबुक का ऐसा प्रभाव खूब होता है। दरअसल ये एक माध्यम को समझ ना पाने का नतीजा है।

एकरसता...
फेसबुक में अब कोई नयापन नहीं है। सूचना में एकरूपता तो है ही, खालिस मनोरंजन के लिए भी कुछ नवीनता नहीं। हर क्षेत्र की तरह यहां भी एक तरह का ठहराव आ गया है। हर तरीके की रचनात्मकता परख लेने के बाद, पाता हूं कि अब यहां सृजनात्मक रोचकता नहीं रह गई है। यहां भारी...और जबरदस्त एकरसता है।

एकरसता अगर सकारात्मक हो भी वो उबाऊ होती है, लेकिन अगर वो नकारात्मक हो तो उबाऊ के साथ-साथ खतरनाक भी होती है। नशे की तरह उसकी लत हो जाती है और आप उससे निकल या उबर नहीं पाते हैं। नकारत्मकता का अपना नशा होता है और जबरदस्त होता है। वैसे ही सृजनशीलता और विनाश का भी नशा होता है। किसी एक तरफ आप झुकते हैं, तो यहां से निकलना मुश्किल हो जाता है।

काफी दिनों से अनुभव किया जा रहा है कि यहां... सभा, विषय और उसमें हो रही बातचीत में भी अब कुछ सीख सकने लायक नहीं रह गया है। एकदम हमारी सचमुच की दुनिया की तरह, हमारे सचमुच के समाज की तरह यहां बातें, बस कहने और बहस करने भर के लिए हो गई हैं।

विचार और उसके प्रस्तुतिकरण में भी यहां कोई नवीनता नहीं है अब। फोटो शेयर कर लें, उसका पोस्टर बना लें, उसका वीडियो कर लें, विचार ऑडियो में प्रस्तुत कर लें, ड्राइंग और टेक्स सब मिला लें...  और सारे तरीके खत्म।अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है यहां कि वीडियो, ऑडियो, टेक्स, और तस्वीरें एक साथ मिलाकर कोई शानदार प्रस्तुतिकरण किया जा सके। ठीक वैसे, जैसे किताब पढ़ते वक्त.... उसमें दिखती तस्वीरें, वीडियो की तरह चलने लगें। आडियो सुनाई दें और तस्वीरें तो हों ही।

अगर मुझे लग रहा है कि ऐसा होना चाहिए तो दुनिया के और भी कई और लोग भी महसूस कर रहे होंगे, खुद जुकरभैया को भी लग ही रहा होगा... शायद वो इसपर काम भी कर रहे हों?

अजीब बात है कि यहां सब गोल-गोल घूमने लगा है। एक ही तस्वीर, वीडियो, पोस्ट और आदमी भी घूम-घाम कर आपतक लौट आएगा। लगता है जैसे आप एक गुट में,  गिरोह या समूह में उलझ या फंस गए हैं। घूमफिर कर उसी समूह की बातें और लोग, आप तक पहुंचते हैं। आप इस गिरोह से बाहर निकल ही नहीं सकते हैं। इसे नजरअंदाज तक नहीं कर सकते।

कोई विचार... जो आपके लिए चुनौतीपूर्ण है, आप उससे बचना चाहते हैं... लेकिन फेसबुक आपको इसकी सुविधा नहीं देता है।

चीजें बुरी नहीं होती। मानव प्रयास से रची हुई हर चीज, शानदार और पावन होती हैं। फेसबुक भी वैसा ही है... अदभुत! जबरदस्त! अब बुराई होती है इसमें कि हम चीजों का इस्तेमाल कैसे करने लगे हैं। बंदूक बुरी नहीं है, बुराई इसमें है कि हम उसका उपयोग कर, लूट और सोची समझी हत्याएं करने लगें।

यहां कई बरसों की सक्रियता से ये जान पाया हूं कि ये अब कचरे का ढेर हो गया है। ठीक वैसे ही जैसे आप भीड़-भाड़वाली जगह से दूर किसी पहाड़ पर एक घर बनाते हैं। धीरे-धीरे... कालातंर में वहां लोग आ बस जाते हैं, जनसंख्या का घनत्व बढ़ जाता है, फिर एक दिन आपको समझ आता है कि आप कचरे के ढेर के ठीक बीचों बीच हैं। फेसबुक की दशा वैसी ही हो गई है। हर किसी की...यहां,  इस तरह से मौजूदगी की वजह से इसकी गुणवत्ता में जबरदस्त गिरावट आई है।

एक विचित्र सड़ांध फैली हुई गई है यहां... ठहराव से फैली सड़ांध... उससे बचना जरूरी है। वर्ना लंबे समय तक अगर आप सड़ांध के बीच मौजूद रहते हैं तो वो आपको सहज और सामान्य लगने लगता है। हमारे समाज में ये बात खूब है। हर चीज यहां इसीलिए स्वीकार्य हैं, और कबूल ली गई हैं को उसे लंबे वक्त तक रहने दिया गया, उससे शुरू में ही बचा नहीं गया। भ्रष्टाचार, बेईमानी, झूठ, फरेब, दोगलापन, गैरबराबरी, नाइंसाफी, हिंसा, असहनशीलता, ये सब सहज है हमारे लिए क्योंकि हम इसमें गले तक डूबे हैं।

फेसबुक में जानकारियों के लिए भी आपको मेहनत नहीं करती पड़ रही। आप जानकारियों को फिल्टर तक नहीं कर सकते। नतीजतन... एकदम गोबर के बहाव की तरह जानकारियों की बमबारी से उकताहट होने लगती है। सूचनाएं भी एक ही तरह की। उनमें से ज्यादतर तो गैरजरूरी और झूठी हैं, वो विश्वसनीय (authentic)भी नहीं हैं।

हमारी पूरी व्यवस्था में, ये अजीब बात है कि जो हमारी तरह नहीं सोचता, उसे होना ही नहीं चाहिए। फेसबुक पर मौजूद भारतीयों में ये खूब है। हमारे सचमुच के जीवन का दोगलापन, यहां भी जबरदस्त है। होना कुछ और है, दिखना कुछ और है। आभासी दुनिया में भी लोग अपनी सच्चाई, स्वीकार करना नहीं चाहते हैं। विचित्र बात है उनसे निपटने में आपको उनसे भी नीचे गिर जाना पड़ता है। खुद को और भी बुरा पेश करने को मजबूर होना पड़ता है।

किसी एक के विरोध में लिखो तो पक्ष के लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट की बमबारी हो जाएगी। लेकिन अगर आपने अपनी ही कही बातों के विरोध में लिखना चाहा तो, मित्रता करने को आतुर रहे, लोग ही आपको गालियां देने लगेंगे। मतलब कि आपको यहां रहना है तो भांट की तरह उनके मन की बात करते रहो... यही आजादी है यहां की।

लेकिन अगर आपको बेशर्त आजादी की आदत है। आप एकदम उनमुक्त और स्वतंत्र हो अपने अनुभव की बातें रखना चाहते हैं तो भी आपको नीचा दिखा, जमीन में गाड़ देने की कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। ऐसी कोशिश भी वो लोग करेंगे, जिनका अनुभव ही आपसे जुदा होगा, वैसे लोग जो आपके बारे में कुछ भी नहीं जानते, तो भी आपके बारे फौरन किसी निर्णय पर पहुंच जाएंगे। ज्यादातर बार तो ये वैसे लोग होंगे, जिनको आपकी तरह का अनुभव तो छोड़िए, अपनी तरह का अनुभव ही नहीं होगा। बातचीत में पता चलेगा कि वो लोग.... लगता है,  हो सकता,  होता होगा,  शायद... जैसे शब्दों की मदद से.... बस मजे के लिए बात कर रहे हैं।

आपका अनुभव है, लेकिन वो उसे भी झुठलाने की कोशिश करेंगे, वो भी किसी तथ्य से नहीं, केवल थोथी बातों से। अजीब बात है कि आप ऐसे लोगों से बच नहीं सकते।

आपको किसी को प्रभावित नहीं करना। कोई समूह नहीं तय करना। कोई गुरूकुल नहीं खोलना, कोई विचारधारा स्थापित नहीं करनी। ना ही किसी विचारधारा की वकालत करनी है, फिर भी आप किसी खास विचारधारा के साथ जोड़कर देखे जाएंगे। जो लोग ऐसा करते हैं दरअसल उनका अपना कोई विचार नहीं होता, व्यक्तित्व तो होता ही नहीं। वो बस ऐसा करते हैं... क्यों? जवाब कोई नहीं दे पाता है।

तो खोज जारी है कि इससे रोचक,  शानदार और अदभुत क्या है।

फेसबुक अब हिन्दी हो गया है। लेकिन आईटी दुनिया में कई और जगह भी हैं, जहां हिन्दी है ही नहीं, तो हिन्दी वहां भी होनी चाहिए। कई तो देवनागरी के अक्षर पहचानते ही नहीं, स्वीकार ही नहीं करते। ऐसी जगहों को खोज, वहां हिन्दी की शुरूआत करना जरूरी है। 

हिन्दी के साथ विचित्र बात है कि किसी को देवनागरी वर्णमाला और हिन्दी पढ़ना आ गया, तो वो खुद को लिखी हुई किसी भी बात पर टिप्पणी करने का अधिकारी मान लेता है। उसे लगता है कि बस पढ़ लेने भर वो महाविद्वान हो गया है।

फेसबुक से आप बच नहीं सकते... तब तो और भी नहीं, जब आपके मित्र और रिश्तेदार वहां हों... आपको उनकी सूचनाएं मिलने की प्रक्रिया में ही फेसबुक की सूचनाएं भी मिला करती हैं...

 

फेसबुक आईडी और पॉसवर्ड से दूसरी कई जरूरी साइटें लॉग-इन करना सहज और आसान है, इसी से भी इसका बना रहना जरूरी है। आहिस्ता-आहिस्ता ये वर्चुअल दुनिया का पहचान पत्र हो गया है। इसीलिए इसे फिलहाल खत्म नहीं किया जा सकता. एक अदभत बात है कि करीब-करीब हर पब्लिक साइट पर, ये सुविधा है कि आप जो भी वहां रचें-लिखे वो खुद-व-खुद फेसबुक तक आ जाएगा।

तो इसे बंद कर देना तो संभव ही नहीं... कि आपकी मित्रता जरूरी है।
अगर ये जरूरी है तो पक्का है हम किसी और जगह भी मिलेंगे। क्योंकि हमारी असली जिंदगी तरह यहां भी हिपोक्रेसी की मौजूदगी, इसे और दिन चलने नहीं देगी। इसका विकल्प आएगा।
 
यहां के मित्रों की गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। जैसे मेरी गतिविधियों की खबर आप तक पहुंचती रहा करती हैं। बिना सक्रिय उलझाव के ऐसे बने रह सकते हैं।  जबतक कि कोई दूसरा उम्दा और बेहतर, शानदार विकल्प उपलब्ध नहीं होता। और वो होगा ही होगा, उसका खोजा जाना बाकी है।
 

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