अतिश्योक्ति, बड़बोलापन कब और कैसे आया हमारे आचरण में?
हमारी महान सभ्यता...!
किसने बताया हमें? कब पता चला कि हमारी सभ्यता महान थी?
हमारी महान संस्कृति..!
कब हुई ये महान? किसके कहने से हुई थी? हमारी महानता का सर्टिफिकेशन कब हुआ?
खुद पर गर्व करने से पहले, खुद को महान बताने से पहले गौर कीजिए कि ये भाव आपमें किसने और कब भरा?
कभी लड़ाया है सांढ़? साढ़ नहीं तो बोतू (बकरा)? मुर्गा ही?
कुश्ती तो देखी होगी कभी? ये ना सही कोई तो प्रतियोगिता देखी होगी?
प्रतियोगिता! सही शब्द है जानने के लिए अपनी महानता के उदभव को। इसी में छिपी है आपकी महानता।
बढ़ जाओं, चढ़ जाओ, भिड़ जाओ, शाबाश... हारना नहीं है... तुम जीतोगे...
इस तरह के ये तरीके, सामनेवालों के विरुध खुद में पैदा हुए कुंठा पर काबू पाने की कोशिश है।
महानता का अहंकार, दरअसल कुंठा का नतीजा है। दूसरे.. आपको खुद से बड़ा दिख रहे हैं। सामने खड़ा व्यक्ति आपको अपने से ज्यादा समर्थ दिख रहा तो आपकी कुंठा आपको, खुद को उससे बड़ा सोचने को विवश कर रहा। ये संतोष देगा आपको। खुद को बड़ा पाने का संतोष नहीं, सामनेवाले को अपने से नीचा देख, सोच पाने का संतोष। ये झूठ है। ये झूठा विश्वास है।
जिस क्षण आपने दूसरे को नीचा देखा, उसी पल आपकी महानता नष्ट हो गई। और अब ये महानता तबतक आप पा नहीं सकेंगे, जबतक कि आप अपनी कुंठा पर विजय नहीं पा लेते। महानता, दूसरे पर जय पाने से नहीं, खुद को जीत लेने से आती है।
सम्राट अशोक जब तक विजेता थे... दुनिया जीतते रहे, तब तक वो निष्ठुर, निर्दयी राजा थे। उन्हें महान तब समझा गया, माना गया... जब उन्होंने दुनिया छोड़, खुद पर जीत हासिल की।
हम सत्यानवेशी रहे हैं... सच की खोज करनेवाले लोग। झूठ हमारा सर्वनाश करेगा, ये हमारे पूर्वज जानते थे।
विजेताओं ने हम पर आक्रमण किया, लेकिन वो हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाए, उल्टे हमसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। हमारा असर उनपर होने लगा। लेकिन कुछ लोग जो विजेताओं की तरह ही हम पर राज करना चाहते थे, उन्होंने विजेताओं से सीख ले ली। वो विजेता, जो हमसे प्रभावित हो हमतक चले आए थे, हमारे लोग, उन लोभी विजेताओं के प्रभाव में आ गये। उन्हें विजेताओ का रवैया सही और ज्यादा सही लगा। ये भाव आया नहीं, कि वो कुंठा से भर गए। ...और उन्होंने सर्वनाश कर दिया। उनकी कुंठा, शुरूआत थी... हमारी महानता की शुरूआत।
वो हमें कुंठित करते गए, हम महान होते गए, उन्होंने हममे और कुंठा भरी, हम और जोर से महान हो लिए। ...और हम गुलाम हो गए, हमारी कुंठा ने हमें, विजेताओं का गुलाम बना दिया।
आहिस्ता आहिस्ता हमारी असली महानता का सच खत्म हो गया और हम विजेताओं के खिलाफ स्थापित झूठी महानता की चादर में लिपटी सभ्यता रह गए।
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हमारी महान सभ्यता...!
किसने बताया हमें? कब पता चला कि हमारी सभ्यता महान थी?
हमारी महान संस्कृति..!
कब हुई ये महान? किसके कहने से हुई थी? हमारी महानता का सर्टिफिकेशन कब हुआ?
खुद पर गर्व करने से पहले, खुद को महान बताने से पहले गौर कीजिए कि ये भाव आपमें किसने और कब भरा?
कभी लड़ाया है सांढ़? साढ़ नहीं तो बोतू (बकरा)? मुर्गा ही?
कुश्ती तो देखी होगी कभी? ये ना सही कोई तो प्रतियोगिता देखी होगी?
प्रतियोगिता! सही शब्द है जानने के लिए अपनी महानता के उदभव को। इसी में छिपी है आपकी महानता।
बढ़ जाओं, चढ़ जाओ, भिड़ जाओ, शाबाश... हारना नहीं है... तुम जीतोगे...
इस तरह के ये तरीके, सामनेवालों के विरुध खुद में पैदा हुए कुंठा पर काबू पाने की कोशिश है।
महानता का अहंकार, दरअसल कुंठा का नतीजा है। दूसरे.. आपको खुद से बड़ा दिख रहे हैं। सामने खड़ा व्यक्ति आपको अपने से ज्यादा समर्थ दिख रहा तो आपकी कुंठा आपको, खुद को उससे बड़ा सोचने को विवश कर रहा। ये संतोष देगा आपको। खुद को बड़ा पाने का संतोष नहीं, सामनेवाले को अपने से नीचा देख, सोच पाने का संतोष। ये झूठ है। ये झूठा विश्वास है।
जिस क्षण आपने दूसरे को नीचा देखा, उसी पल आपकी महानता नष्ट हो गई। और अब ये महानता तबतक आप पा नहीं सकेंगे, जबतक कि आप अपनी कुंठा पर विजय नहीं पा लेते। महानता, दूसरे पर जय पाने से नहीं, खुद को जीत लेने से आती है।
सम्राट अशोक जब तक विजेता थे... दुनिया जीतते रहे, तब तक वो निष्ठुर, निर्दयी राजा थे। उन्हें महान तब समझा गया, माना गया... जब उन्होंने दुनिया छोड़, खुद पर जीत हासिल की।
हम सत्यानवेशी रहे हैं... सच की खोज करनेवाले लोग। झूठ हमारा सर्वनाश करेगा, ये हमारे पूर्वज जानते थे।
विजेताओं ने हम पर आक्रमण किया, लेकिन वो हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाए, उल्टे हमसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। हमारा असर उनपर होने लगा। लेकिन कुछ लोग जो विजेताओं की तरह ही हम पर राज करना चाहते थे, उन्होंने विजेताओं से सीख ले ली। वो विजेता, जो हमसे प्रभावित हो हमतक चले आए थे, हमारे लोग, उन लोभी विजेताओं के प्रभाव में आ गये। उन्हें विजेताओ का रवैया सही और ज्यादा सही लगा। ये भाव आया नहीं, कि वो कुंठा से भर गए। ...और उन्होंने सर्वनाश कर दिया। उनकी कुंठा, शुरूआत थी... हमारी महानता की शुरूआत।
वो हमें कुंठित करते गए, हम महान होते गए, उन्होंने हममे और कुंठा भरी, हम और जोर से महान हो लिए। ...और हम गुलाम हो गए, हमारी कुंठा ने हमें, विजेताओं का गुलाम बना दिया।
आहिस्ता आहिस्ता हमारी असली महानता का सच खत्म हो गया और हम विजेताओं के खिलाफ स्थापित झूठी महानता की चादर में लिपटी सभ्यता रह गए।
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